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कोरोना की ढाल का गलत इस्तेमाल -जर्नलिस्ट राकेश अचल द्वारा लेख
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कोरोना की ढाल का गलत इस्तेमाल -जर्नलिस्ट राकेश अचल द्वारा लेख

विश्वव्यापी कोरोना महामारी के चलते देश-दुनिया के बहुत कुछ ठहर गया है लेकिन भारत में इसमहामारी को राजनीति ने जनतांत्रिक व्यवस्थाओं के खिलाफ ढाल के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है .कोरोना के कारण लाकडाउन को छोड़कर सब कुछ पूर्ववत चल रहा है लेकिन न संसद का सत्र बुलाया जा रहा है और न विधानसभाएं बैठ रहीं हैं .सरकारें निर्वाचित सदनों को कमजोर करने के लिए  कोरोना को ढाल लिए खड़ी नजर आती है .

देश में एक महीने से दिल्ली के बाहर आंदोलनकारी किसान बैठे हैं.भाजपा बंगाल ,असम,मणिपुर में चुनावी रैलियां कर रही है. राजनीतिक दलों के दफ्तरों का उद्घाटन हो रहा है,प्रशिक्षण शिविर चल रहे हैं लेकिन संसद और विधानसभाओं के दरवाजे नहीं खुल रहे .जिन सदनों में बैठकर जनता से जुड़े विषयों पर विमर्श होना है वे सब मुल्तबी कर दिए गए हैं,सरकारें जो मन में आ रहा है सो कर रहीं हैं.जन प्रतिकार के तमाम स्वरों को अनसुना किया जा रहा है .

ताजा मामला मध्यप्रदेश का है यहां विधानसभा का शीतकालीन सत्र 28  दिसंबर से शुरू होना था लेकिन सरकार ने अचानक उसे रद्द कर दिया ये कहकर कि विधानसभा के अनेक कर्मचारी कोरोना संक्रमित हैं और कोरोना प्रोटोकॉल   के तहत सदन में सभी विधायकों को बैठने की सुविधा  उपलब्ध नहीं है .कोरोना को आये दस महीने हो चुके हैं,इतना ही समय मध्यप्रदेश  में तख्तापलट कर आयी भाजपा सरकार को भी हो चुका है,क्या इतने समय में सरकार विधानसभा स्तर बुलाने के लिए जरूरी इंतजाम नहीं कर सकती थी ? सरकार जो चाहे सो कर सकती है ,किन्तु जब करने का मन ही न हो तो कोई क्या कर सकता है ?

हास्यापद बात ये है कि मध्यप्रदेश की सरकार विपक्ष से कह रही है कि यदि विपक्ष सभी विधायकों के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी ले तो सदन का स्तर बुलाया जा सकता है .विपक्ष ने भी हाथ खड़े कर दिए हैं,मध्यप्रदेश में विपक्ष तो शुरू से ही हाथ खड़े किये हुए दिखाई दे रहा है. उम्रदराज हो चुके प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष प्रदेश में कांग्रेस की नाव डुबोने के बाद भी दो-दो पदों पर काबिज हैं ,वे कैसे सरकार के फैसलों का विरोध कर सकते हैं ?मध्यप्रदेश देश का ऐसा पहला राज्य है शायद जहां विधानसभा का स्थायी सभापति नहीं है,जहाँ हाल के उपचुनाव में जीते 28  विधायकों को एक माह बाद भी सदन की सदस्य्ता की शपथ नहीं दिलाई जा सकी  है .

मध्यप्रदेश जैसा ही हाल दुसरे राज्यों का भी है. केंद्र की सरकार भी संसद को स्थगित कर बैठी हुई है.'न होगा बांस और न बजेगी बाँसुरी' की कहावत चरितार्थ की जा रही है इस समय कोरोना का लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं के खिलाफ स्तेमाल की ये बेमिसाल मिसाल है .दुनिया के दूसरे देशों में भी कोरोना संक्रमण के चलते अल्पकाल के लिए निर्वाचित सदन स्थगित  किये गए लेकिन उन्हें चिरकाल के लिए नहीं टाला गया .कोरोना एक हकीकत है ,लेकिन इसके चलते दुनिया चल रही है.रेलें चल रहीं हैं,हवाई जहाज उड़ रहे हैं,अस्पताल चल रहे हैं,माल खुले हैं,सिनेमाघर खुले हैं,अदालतें भी काम कर ही रहीं हैं ,फिर संसद और विधानसभाओं को बंद रखना संदेह उतपन्न करता है .

आपको याद दिला दूँ कि कोरोना महामारी के इस संकटकाल में दुनिया के तमाम छोटे-बड़े देशों की संसदीय गतिविधियों का ब्योरा इस संस्था की वेबसाइट पर उपलब्ध है.लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र यानी भारत की संसदीय गतिविधि का कोई ब्योरा आपको वहाँ नहीं मिलेगा. ज़ाहिर है, इस कोरोना काल में भारत की संसद पूरी तरह निष्क्रिय रही है और अब भी उसके सक्रिय होने के कोई आसार नहीं दिख रहे हैं.

आपको याद होगा कि , संसद का बजट सत्र जनवरी में 31 तारीख़ को शुरू हो गया था, जो 23 मार्च तक चला. पूरे सत्र के दौरान 23 बैठकों में कुल 109 घंटे और 23 मिनट कामकाज हुआ था.लेकिन इस दौरान दोनों सदनों में कोरोना संकट पर कोई चर्चा नहीं हुई थी, जबकि कोरोना संक्रमण जनवरी महीने में ही भारत में दस्तक दे चुका था.अलबत्ता सत्र का आकस्मिक समापन निर्धारित समय से 10 दिन पहले ही कोरोना संकट के नाम पर कर दिया गया, संसद को तय कार्यक्रम के मुताबिक़ तीन अप्रैल तक चलना था.
पिछले 9  महीने में अनेक अवसरों पर ये उम्मीद जताई जा रही थी कि सरकार कोरोना संकट से निबटने के लिए आवश्यक क़दम उठाने के बाद संसद का एक विशेष संक्षिप्त सत्र आयोजित करेगी, हालाँकि ऐसा करने की कोई संवैधानिक बाध्यता नहीं है.

संवैधानिक प्रावधानों के मुताबिक़ एक वर्ष में संसद के तीन सत्र होना अनिवार्य है और किन्हीं दो सत्रों के बीच छह महीने से अधिक का अंतराल नहीं होना चाहिए.अब ये अंतराल छह क्या ९ माह का हो चुका है ,किन्तु किसी को सदन बुलाने की न चिंता है और न कोई जरूरत .मानवीय आपदा और लोकतांत्रिक तकाजे के तहत अपेक्षा की जा रही थी कि सरकार संवैधानिक प्रावधान या तकनीकी पेंच का सहारा नहीं लेगी और संसद का विशेष सत्र बुलाएगी,लेकिन इस दिशा में सरकार ने न तो अपनी ओर से कोई दिलचस्पी दिखाई और न ही इस बारे में विपक्षी सांसदों की मांग को कोई तवज्जो दी.

केंद्र की देखादेखी राज्य सरकारों ने भी कोरोना का राजनीतिक इस्तेमाल अपने-अपने राज्य में विधानसभाओं को पंगु बनाने के लिए करना शुरू कर दिया है, जिन राज्यों में विधानसभाओं के सत्र बुलाये भी गए वे एक-दो दिन से अधिक के नहीं थे .उल्लेखनीय है कि लॉकडाउन प्रोटोकॉल और फिजिकल डिस्टेंसिंग की अनिवार्यता का ध्यान रखते हुए तमाम देशों में सांसदों की सीमित मौजूदगी वाले संक्षिप्त सत्रों का या वीडियो कांफ्रेंसिंग वाली तकनीक का सहारा लेकर 'वर्चुअल पार्लियामेंट्री सेशन' का आयोजन किया गया है.कई देशों ने संसद सत्र में सदस्यों की संख्या को सीमित रखा है, तो कुछ देशों में सिर्फ़ संसदीय समितियों की बैठकें ही हो रही हैं.लेकिन इस सबके विपरीत दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में सरकार की जवाबदेही को तय करने वाली संसद अभी तक निष्क्रिय बनी हुई है.

संसद के प्रति सरकार यानी प्रधानमंत्री की उदासीनता को देखते हुए सत्तारूढ़ दल के सांसदों ने भी अपनी अध्यक्षता वाली संसदीय समितियों की बैठक आयोजित करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. भारत में विभिन्न मंत्रालयों से संबंधित 24 स्थायी संसदीय समितियाँ हैं, जिनमें से इस समय 20 समितियों के अध्यक्ष सत्तारूढ़ दल के सांसद हैं.जिन विपक्षी सांसदों ने अपनी अध्यक्षता वाली समितियों की बैठक वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए बुलाने की पहल की, उन्हें राज्यसभा और लोकसभा सचिवालय ने रोक दिया.

राज्यसभा में कांग्रेस के उप नेता आनंद शर्मा गृह मंत्रालय सें संबंधित मामलों की संसदीय समिति के अध्यक्ष हैं. पिछले दिनों वे चाहते थे कि समिति की बैठक वीडियो कांफ्रेंसिंग के ज़रिए हो, लेकिन राज्यसभा सचिवालय ने इसके लिए मना कर दिया है.

इसी तरह सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी संसदीय समिति के अध्यक्ष शशि थरूर ने भी अपनी समिति की बैठक वीडियो कांफ्रेंसिंग के ज़रिए कराने की अनुमति मांगी थी, जो लोकसभा सचिवालय से नहीं मिली.दोनों सदनों के सचिवालयों की ओर से दलील दी गई कि संसदीय समिति की बैठकें गोपनीय होती हैं, लिहाजा वीडियो कांफ्रेंसिंग के ज़रिए बैठक करना नियमों के विरुद्ध है.

मजे की बात ये है कि इसी दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश भर के मुख्यमंत्रियों के साथ वीडियो कांफ्रेंसिंग के ज़रिए बैठकें की हैं, पीएम मोदी की पहल पर ही दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के सदस्य देशों के प्रमुखों की वर्चुअल मीटिंग हो चुकी है, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट वीडियो कांफ्रेंसिंग के ज़रिए मामलों की सुनवाई कर रहे हैं, देश के कैबिनेट सचिव अक्सर राज्यों के मुख्य सचिवों के साथ वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए मीटिंग करते ही हैं, तो फिर संसदीय समिति की बैठक वीडियो कांफ्रेंसिंग के ज़रिए क्यों नहीं हो सकती?

हैरानी की बात ये है कि इतनी बड़ी वैश्विक मानवीय त्रासदी के दौरान देश की सर्वोच्च नीति निर्धारक संस्था और सबसे बड़े राजनीतिक मंच यानी संसद तथा राज्य विधानसभाओं  को भूमिकाहीन बना दिए जाने की अभूतपूर्व घटना भारत में हो रही है.किन्तु न देश की अदालतें संज्ञान ले रहीं हैं और न जनता के चुने हुए प्रतिनिधि. सबको अपनी-अपनी जान की पड़ी है.लोकतंत्र जाए भाड़ में. 

@ राकेश अचल

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