
नई दिल्ली। हिंदी दैनिक देशबन्धु के प्रधान संपादक ललित सुरजन जी का बुधवार रात 8:06 बजे निधन हो गया। सोमवार शाम को उन्हें ब्रेन हैमरेज के कारण पूर्वी दिल्ली के धर्मशिला-नारायणा अस्पताल में भर्ती कराया गया था। अस्पताल में उन्हें वेंटीलेटर पर रखा गया था। ललित सुरजन जी का अंतिम संस्कार कल गुरुवार को रायपुर में किया जाएगा। मुख्यमंत्री ने राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार की घोषणा की है।
ललित सुरजन जी के निधन पर वरिष्ठ पत्रकार राकेश अचल याद करते हुए लिखते हैं बात आज की नहीं, 37 साल पुरानी है। तब मैं 22 का और ललित जी 38 के रहे होंगे। पहली मुलाकात ग्वालियर में हुई थी। बाबू मायाराम सुरजन के अनुचर थे हम सब और ललित जी हमें इसीलिए अपने परिवार का हिस्सा मानते थे। तब देशबंधु की अलग प्रतिष्ठा थी, अलग पहचान थी।
हम प्रगतिशील लेखकों के लिए तो बाबूजी, देशबन्धु और ललित जी अलग थे ही नहीं। लंबी कद काठी के ललित जी सूट-बूट वाले थे और हम बाबूजी की तरह धोती कुर्ता वाले। कुछ तो था जो हमें बांधे था।उन दिनों मैं उनके सामने बहुत छोटा होता था। उन्हे मुझसे बात करने के लिए झुकना पड़ता था।तब वे संपादक ज्यादा थे,लेखक कम। लेकिन लेखकों से लिखवाना वे खूब जानते थे।
ग्वालियर में तब देशबंधु का काम राजेंद्र श्रीवास्तव देखते थे,आज भी देखते हैं लेकिन उन दिनों साहित्य और संस्कृति पर मेरा लिखा अधिक छपता था देशबन्धु में। ललित जी ही इसके पीछे थे। गांवों की दशा दुर्दशा पर वे खूब लिखवाते थे।एक अरसे तक सिलसिला जारी रहा। फिर मै अपनी नौकरियों में फंसता गया और देशबन्धु के साथ साथ ललित जी से मिलना जुलना कम हो गया।यदा कदा जब भी मिले अभिभावक की ही तरह मिले।एक युग से उनसे मुलाकात नहीं हुई थी।अब जब मिलने की सूरत बन रही थी तो वे अचानक चले गए एक अनंत यात्रा पर।
अब ललित जी जैसे संपादक चिराग लेकर खोजने पर भी नहीं मिलने वाले। खुद उनके अपने लोगों में ललित जी जैसी बात नहीं है। ललित जी के पास करमदी,कलाम था और कला थी,जीने की ललित कला। भगवान ने उन्हें अलग से बनाया था।वे न अपने पिता की अनुहारी थे और न भाइयों जैसे।वे सबसे अलग थे। उनमें जो लालित्य था वो सर्वथा भिन्न था। ललित जी के जाने से अविभाजित मध्यप्रदेश और अब छत्तीसगढ़िया हिन्दी पत्रकारिता को भारी आघात पहुंचा है।उनकी स्मृतियों को प्रणाम करते हुए विनम्र श्रद्धांजलि।
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