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अन्नदाता से जूझती सरकार और भाजपा -राकेश अचल द्वारा लेख
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अन्नदाता से जूझती सरकार और भाजपा -राकेश अचल द्वारा लेख

पूरे सत्रह दिन हो गए,लेकिन दिल्ली ने किसानो की नहीं सुनी,मोर्चे पर डटे ग्यारह किसानों की मौत पर सरकार की आँख से एक आंसू नहीं गिरा,और अब उलटे सरकार तथा पूरी सरकारी पार्टी आंदोलनरत किसानों को सबक सिखाने के लिए लाम पर है .दोनों मिलकर ये साबित करने पर आमादा हैं की किसानों का आंदोलन देशद्रोह  है और आंदोलन के पीछे देशद्रोही संगठन तथा उनके नेता हैं .

हैरानी तब होती है जब सरकार किसानों की मांगों के बारे में कुछ न कह पाने की स्थिति में होती है और हारकर सवाल कर उठती है कि किसान आंदोलन में किसानों के साथ उन लोगों की तस्वीरें क्यों हैं जिन्हें सरकार ने दंगाई बताकर जेलों में डाल रखा है .जाहिर है कि किसानों के आंदोलन में इस देश में सक्रिय वे तमाम संगठन शामिल हैं जो अब तक प्रतिबंधित नहीं किये गए हैं. केवल सरकार से असहमत होने केकारण उन्हें देशद्रोही मान लेना एक तरह की सियासी असहिष्णुता है .
देश में ये पहली बार हुआ ही कि एक ताकतवर सरकार किसानों के आंदोलन को सत्ररह दिन बाद भी तोड़ नहीं पायी है इसलिए अब हारकर हथकंडों का इस्तेमाल किया जा रहा है. आंदोलनरत किसानों के खिलाफ झूठे मुकदमे दर्ज किये जा रहे हैं,उन्हें कोविद फ़ैलाने के लिए जिम्मेदर ठहराया जा रहा है ,डराया धमकाया जा रहा है और किसान आंदोलन के खिलाफ दुष्प्रचार के लिए पूरे सरकारी मीडिया के सतह गोदी मीडिया को तैनात कर दिया गया है .बीती रात परम आदरणीय  'आपकी अदालत ' के वकील  रजत शर्मा किसान आंदोलन से जुड़े तमाम नेताओं की कुंडली खोलकर बैठे थे .

किसानों को तोड़ने में नाकाम सरकार और सरकारी पार्टी ने अब देश के  अलग-अलग हिस्सों में 700  सभाएं कर किसानों को विवादित कानूनों का सच बताने का फैसला किया गया है. सरकार दिल्ली की देहलीज पर सत्रह दिन से बैठे किसानों से निर्णायक बात करने के बजाय अब उनके खिलाफ गली -गली जाकर प्रहसन करने पर मजबूर है .सरकार और सरकारी पार्टी की हताशा देखकर कभी-कभी हंसी आती है तो कभी-कभी दया .मन द्रवित हो जाता है  देश की किसान प्रेमी सरकार की उछल-कूद देखकर कर .
मुझे ये स्वीकार करने में कोई ऐतराज नहीं है कि सरकार की अपनी विवशताएँ होती हैं लेकिन वे राजहठ का रूप ले लेती हैं ये मेरी क्या किसी की समझ में नहीं आता .सवाल ये है कि यदि सरकार किसानों का हित चाहती है तो फिर किसानों की बात क्यों नहीं सुनती?किसानों के आंदोलन को सरकार उखाड़ने की साजिश क्यों मानती है ?क्या किसान अकेले एक मजबूत सरकार को उखाड़ सकते हैं ?शायद नहीं.किसानों की मांगे स्पष्ट और सीमित हैं ,किसानों के आंदोलन से सरकार फिलहाल उखड़ने वाली नहीं है हाँ सरकार की साख को बट्टा जरूर लग सकता है .

मौजूदा सरकार को इन्हीं आंदोलनरत किसानों ने सत्ता तक पहुंचाया था,अब यही किसान अपने किये की गलती भुगत रहे हैं ,अन्यथा किसानों के जनादेश से बनी सरकार किसानों को ठेंगा न दिखाती ,आज सरकार सीधे-सीधे किसानों को हड़का रही है और आने वाले कुछ ही घंटों बाद आप देखेंगे कि आंदोलनरत किसानों को दिल्ली की देहलीज से बलात खदेड़ा जा रहा है. सरकार को किसानों पर बल प्रयोग करने में अब शायद ही संकोच हो .हमारी सरकार दुस्साहसी सरकार है .सरकार को किसी भी वर्ग पर लाठी-गोली चलने में कोई संकोच शायद अब नहीं है .

हकीकत ये है कि सरकार किसानों से ज्यादा उन धनपशुओं से भयभीत है जिनके लिए ये कथित क़ानून बनाये गए हैं. सरकार न कानूनों के जरिये देश के धनपशुओं को जो लाभ देने का वादा कर चुकी है यदि उनसे पीछे हटती है तो ये धनपशु सरकार को ठेंगा दिखा सकते हैं. इनकी पूंजी की ताकत किसानों की एकजुटता की ताकत से शायद कहीं ज्यादा है .इन कानून के बनाने में किसानों से जयदा बड़ी भूमिका इन्हीं धनपशुओं की है. वे नए कानूनों से होने वाले मुनाफे की प्रत्याशा में अपनी तमाम पूँजी दांव पर लगा चुके हैं .अब यदि क़ानून वापस लिए हगाये तो इन तमाम पूँजीपतिओं का भट्टा बैठ जाएगा .और सरकार ऐसा होने नहीं देगी .

देश में ये पहली बार हो रहा है कि दिल्ली में होते हुए भी एक प्रधानमंत्री आंदोलनरत किसानों से बातचीत करने के लिए राजी नहीं है. सरकार के तमाम मंत्री किसानों को संतुष्ट करने में नाकाम रहे हैं ,नौकरशाही   नाकाम रही है.ऐसे में प्रधानमंत्री ने आगे आने के बजाय अब किसानों के दमन का सहारा ले रहे हैं .ये दुर्भाग्यपूर्ण होने के साथ ही अलोकतांत्रिक भी है .कोई भी क़ानून किसान से बड़ा नहीं हो सकता .क़ानून किसान के लिए बनाया गया है ,किसान क़ानून के लिए नहीं बना .किसानों के लिए कानून कोई एक दिन में नहीं बने थे ,कमी केवल इतनी रह गयी कि ये कानून किसानों को  भरोसे में लेकर नहीं बनाये गए .इस कमी को दूर किया जा सकता है ,इन कानूनों को वापस लेकर .

बीते ९ माह से कोरोना से जूझ रहे देश में किसानों का  आंदोलन केवल सत्ता उखाड़ने का अभियान नहीं हो सकता .देश में कोई ऐसा राजनीतिक दल नहीं है जो किसानों को संगठित कर सरकार को अस्थिर करने की क्षमता रखता हो. कांग्रेस,वामपंथी,समाजवादी सब मिलकर भी आज की तारीख में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की सत्ता को नहीं हिला सकते ,हाँ मोदी सरकार को सवालों के घेरे में लाने की क्षमता इन विपक्षी दलों में है और ये उन्होंने कर दिखाया है .अब यदि सरकार इतने में ही अपनी कुर्सी के लिए खतरा देखती है तो कोई कुछ नहीं कर सकता ..
मेरा अनुभव कहता है कि सरकार लाठी-गोली के बल पर किसान आंदोलन को तितर-बितर तो कर सकती है लेकिन समूल समाप्त नहीं कर सकती .सरकार अब ऐसा ही कर रही है क्योंकि सत्रह दिन के घेराव से दिल्ली हांफने लगी है .पहले से परेशान दिल्ली का आम जनजीवन किसान आंदोलन से अब सीधे प्रभावित होने लगा है .यदि किसान आंदोलन और लंबा  खिंचा तो दिल्ली और सरकार के खिलाफ खड़ी हो सकती है और सरकार एक साथ दो-दो मोर्चों पर लड़ने में फिलहाल समर्थ नहीं है .ऐसे में यदि दिल्ली को बचाना है तो सरकार को किसानों के साथ सम्मनजनक व्यवहार करते हुए उन्हें वापस घर भेजना पडेगा .ये तभी मुमकिन है जबकि किसानों के लिए बनाये गए नए कानून  वापस ले लिए जाएँ .
आंदोलनरत किसानों के साथ तो मेरी सहानुभूति पहले से थी अब मुझे सरकार पर भी दया आ रही है. सरकार की गति उस सांप जैसी हो गयी है जिसके मुंह में छणछोड़र है.जिसे अब न सरकार निगल पा रही है और न उगल पा रही है .जबकि हकीकत ये है कि छणछोड़र जहरीली नहीं है उसे आसानी से बातचीत के जरिये बाहर निकाला जा सकता है .हठधर्मी समस्या का समाधान नहीं दे सकती .हठधर्मी से बात बनने के बजाय और बिगड़ेगी .सरकार और सरकारी पार्टी का किसान विरोधी दुष्प्रचार अभियान भी कोई रास्ता नहीं निकाल पायेगा.
@ राकेश अचल

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