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इन्तिहाँ हो गयी इन्तजार की - राकेश अचल द्वारा लेख
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इन्तिहाँ हो गयी इन्तजार की - राकेश अचल द्वारा लेख

एक ही मुद्दे पर बार-बार लिखना आसान नहीं होता लेकिन जब देश का किसान एक पखवाड़े से अपनी मांगों को लेकर खुले आसमान के नीचे बैठा हो तो कलम रुकती भी नहीं है .भारत की मजबूत सरकार की किसानों के मामले में ये पहली और अब तक की सबसे बड़ी नाकामी है.नाकामी इसलिए की पांच दौर  की वार्ता के बावजूद सरकार आंदोलनरत किसानों को हल नहीं दे पायी है और आज जब निर्णायक वार्ता होना थी तो उसे भी टाल दिया .इसे इन्तजार की इन्तिहाँ कहा जा सकता है । 

देश में आजादी के बाद का अब तक का ये सबसे बड़ा और संयमित आंदोलन है ,सरकार के निर्णय के लिए प्रतीक्षा का भी सबसे लंबा दौर भी है ये. बीती रात केंद्रीय गृहमंत्री ने अचानक आंदोलनरत किसान संगठनों   में से 13  को वार्ता के लिए न्यौता  देकर किसान एकता को भंग करने की नाकाम कोशिश की लेकिन जब उन्हें इसमें भी कामयाबी नहीं मिली तो आज होने वाली छठवें दौर की वार्ता को अचानक रद्द कर दिया गया .अब ये प्रमाणित हो गया है कि सरकार 'राजहठ' पर आमादा है और उसे सर्दी में सड़क पर बैठे किसानों की मांगों से ज्यादा अपनी मान-प्रतिष्ठा की चिंता है .कायदे से इस नाकामी को स्वीकार करते हुए जिम्मेदार वार्ताकारों को अपना पद छोड़ देना चाहिए । 

किसान संगठनों की मांग स्पष्ट है कि किसानों के लिए बनाये गए तीनों कानूनों को वापस लिया जाये .सरकार अब तक इस मांग को टालती जा रही है. सरकार ने अब तक किसानों के सामने पांच प्रस्ताव रखे लेकिन किसान संगठन अपनी मांगों से पीछे हटने को तैयार नहीं है और सरकार भी अपनी जिद में अड़ी है. इस टकराव से तो अब लगने लगा है कि सरकार आंदोलनरत किसानों पर जरूरत पड़ी तो गोली का इस्तेमाल भी कर सकती है .और यदि ऐसी नौबत आती है तो ये देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य होगा .सरकार को इससे बचना चाहिए । 

सरकार की नाकामी के विरोध में विपक्षी दल राष्ट्रपति से मिलने की तैयारी कर रहे हैं,लेकिन ये महज एक औपचारिकता है,क्योंकि राष्ट्रपति के हाथ में कुछ है ही नहीं. जिसके हाथ में है वो इस मुद्दे पर बातचीत  करने के लिए राजी ही नहीं है .विसंगति   देखिये कि एक तरफ प्रधानमंत्री खुद को फकीर बताते नहीं थकते और दूसरी तरफ देश के आंदोलनरत किसानों से सीधे संवाद करने में उन्हें लाज आती है .पिछले एक पखवाड़े में सरकार ने किसान आंदोलन को लेकर जो रवैया अख्तियार किया है उससे सरकार की अपरिपक्वता ही प्रदर्शित हुई है ..किसानों की मांगे ऐसी नहीं है जिसे सरकार अपनी प्रतिष्ठा से जोड़े.सरकार हाल ही में बनाये गए कानूनों को रद्द कर दे तो कोई पहाड़ टूटने वाला नहीं है.हाँ देश के धनपशुओं के साथ सरकार द्वारा किया गया मौखिक अनुबंध अवश्य खतरे में पड़ सकता है । 

किसानों ने अपनी मांगों के संदर्भ में आंदोलन  का जो भी रास्ता लोकतांत्रिक हो सकता है इस्तेमाल कर लिया है. वे शांतिपूर्वक   दिल्ली के बाहर डेरा डाले हुए हैं,अनेक किसान सर्दी से अपनी जान गंवा चुके हैं. किसान और उनके शुभचिंतक संगठन देश बंद कर चुके हैं. अब किसानों के पास सिवा अनशन के कोई और चारा नहीं बचा है. सरकार किसानों को थका कर हिंसा के लिए बाध्य कर रही है और किसान हैं कि लगातार संयम बनाये हुए हैं .ये हैरानी  की बात है कि आज किसानों के आंदोलन में कोई महात्मा  गांधी,कोई जयप्रकाश नारायण नहीं है फिर भी आंदोलन शांत बना हुआ है लेकिन सरकार इसे गंभीता से नहीं ले रही है और बातचीत की आड़ में आंदोलन को नाकाम करने का कुत्सित प्रयास कर रही है.
पिछले छह साल में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के सामने आज जैसी परिस्थितियां कभी नहीं आयीं.आज मोदी और उनकी पूरी सरकार की प्रतिष्ठा दांव पर है. पूरी दुनिया में इस किसान आंदोलन की गूँज हो रही है. विदेशों में किसानों के समर्थन में जुलूस-जलसे हो रहे हैं. कनाडा को तो भारत सरकार हड़का भी चुकी है लेकिन सवाल ये है कि आखिर कब तक ,कब तक निर्णय को टाला जा सकेगा ?,क्योंकि अब ये आंदोलन न हताश विपक्ष का है और न इसके पीछे कोई अंतर्राष्ट्रीय शक्तियां हैं .इस आंदोलन के पीछे देश के किसान हैं और वे पीछे हटने को तैयार नहीं हैं । 

सरकार के सामने अब दो ही विकल्प बचे  हैं कि या तो किसानों की मांगों को बिना शर्त मान लिया जाये या फिर दिल्ली की सीमाओं को जलियांवाला बाग़ बना दिया जाये .किसान एक पखवाड़े तक सड़क पर बैठने के बाद खाली हाथ तो वापस जाने से रहे .किसानों ने अब तक न तो सुरक्षाबलों के साथ कोई अशिष्टता की है और न ही अपना संयम खोया है. अगर किसी ने कुछ खोया है तो सरकार ने अपनी साख खोई है,अपनी लोकप्रियता को बट्टा लगाया है ..आने वाले समय में यदि किसानों के प्रति सख्ती बरती गयी तो ये साख मिट्टी में मिल जाएगी ..
किसान आंदोलन को लेकर अब तक सामूहिक नेतृत्व के फार्मूले पर चलने वाली सरकार के मंत्री कोई हल नहीं निकाल सके हैं. कृषि मंत्री के साथ वार्ता में शामिल होने वाले रेल मंत्री भी नाकाम साबित हुए हैं और इस नाकामी में सरकार के संकटमोचक अमित शाह का नाम भी जुड़ गया है .वे भी किसान एकता को भांग नहीं करा सके. अब बचे हैं प्रधानमंत्री जी.बेहतर हो कि वे खुद मोर्चे पर आएं और मसले को सौहार्द के साथ हल करें. उनके लिए ये कोई कठिन काम नहीं है. प्रधानमंत्री जी चुटकी बजाकर इस काम को कर सकते हैं लेकिन इसके लिए उन्हें दम्भ की शाल उतार कर फेंकना होगी । 

किसान आंदोलन को लेकर सरकार के रुख में आये दिन हो रहे बदलाव से कम से कम मेरी धुकधुकी तो तेज हो ही गयी है.मुमकिन है कि ऐसा ही हाल पूरे देश का हो .सरकार को चाहिए कि देश का रक्तचाप बढ़ने से पहले ही इस समस्या का निदान कर दिया जाये तो बेहतर है .अब सरकार के लिए कांग्रेस कोई चुनौती नहीं है,सरकार की टक्कर  अपने अहंकार से है । 

@ राकेश अचल 

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