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ठिठुरते दिन ,भाजी और भौजी- राकेश अचल द्वारा लेख
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ठिठुरते दिन ,भाजी और भौजी- राकेश अचल द्वारा लेख

जो फर्जी किसान हैं उन्हें नहीं पता कि ठिठुरते दिनों में दिल्ली घेरने के बजाय भौजी के साथ खेतों में चने की भाजी तोड़ना कितना आल्हादित करने वाला काम होता है .इन दिनों किसानों के घरों में तनाव है,ऐसे में भाजी तोड़ने कौन भला खेतों में जा सकता है ?लेकिन आज से पचास साल पहले ऐसे ही ठिठुरते दिनों में ये बच्चा चने के खेतों में ही मौजूद दिखाई देता था .
शहरों में रहने वाले लोग जिनकी जड़ें गांवों में हैं वे आज मेरे साथ अतीत की खिड़की खोलकर पचास साल पीछे के दृश्य देख सकते हैं .अनुभव कर सकते हैं उस सोंधेपन को जिसे कोई अम्बानी,अडानी डिब्बाबंद कर अपने स्टोर में नहीं बेच सकता .दरअसल खुशबू और स्वाद डिब्बाबंद हो ही नहीं सकते.आप जो डिब्बाबंद खुशबुएँ और स्वाद इस्तेमाल करते हैं वे नकली होते हैं ,सेहत के लिए  तो बिलुल फायदेमंद नहीं होते .

इन दोनों हम लोग अपने गांव में होते थे. दिन का भोजन समाप्त होते ही नव वधुएं और षोडशी लड़कियां घर के काम-काज से फारिग होकर चने की भाजी खोंटने खेतों में ऐसे जाते थे जैसे किसी मेले में जा रहे हों. चने की भाजी खोंटना एक ललित कला है. भाजी को किसी धारदार औजार से नहीं काटा जा सकता. भाजी खोंटना कुछ-कुछ चाय की पत्तियों को चुनने जैसा काम होता है. इसमें आपके पास  चने के झाड़ के  कोमल भाग की पहचान करने की दृष्टि और अंगूठे तथा तर्जनी के बीच एक अघोषित तालमेल का होना आवश्यक होता है .

नव वधुओं को इस बहाने से खेती-किसानी के काम से जोड़ा जाता है और षोडषियां  साल भर के लिए भाजी एकत्र करने का काम करती हैं. सर्दियों में तो हरी और ताजी चने की भाजी खाने-पकाने  के लिए उपलब्ध होती है लेकिन गर्मियों में इस्तेमाल के लिए इसे तोड़कर,धोकर,सुखाकर काटकर रखना पड़ता है. ये सब पारम्परिक 'फ़ूड प्रोसेसिंग' होती है .हम बच्चे इस मौके के लिए पहले से घर में बने ताजा मिर्च के चटपटे अचार के साथ फूल वाली धनिया की चटनी पहले से तैयार करके रखते थे .चने की भाजी खाने के लिए ये दोनों चीजें तो चाहिए ही .

चने की भाजी यानि चने के झाड़ का सबसे कोमल हिस्सा होता है. इसे अंगूठे और तर्जनी के नाखूनों के सहारे इतनी सावधानी से तोड़ा जाता है की चने के झाड़ को भी दर्द न हो और नवोदित पत्तियां भी अलग हो जाएँ .चने की भाजी को खाने के लिए इसे धोया नहीं जाता,दरअसल चने की अनधुली भाजी में एक नुनखरापन होता है .इसके साथ अगर आप चटनी या अचार भी खा लें तो फिर जो स्वाद बनता है वो शब्दातीत है .चने खोंटने  वाले भाजी खाते भी जाते हैं और संग्रहित भी करते जाते हैं इसके लिए महिलाएं अपनी साड़ी के पल्लू या लडकियां दुपट्टे की जेब सी बना लेती हैं .लड़के अपने पेण्ट,पायजामे की जेबों के अलावा स्वेटर को पलटकर उसमें भी भाजी भर लेते हैं .मुंह तो हर समय भाजी से भरा ही रहता है. 

भाजी तोड़ते समय भौजी से जो चुहलबाजी होती है उसका वर्णन करूँ  तो उसे आज के लोग अश्लील कह देंगे.इस चुहलबाजी में चटनी और मिर्च के अचार की छीना-झपटी भी शामिल होती थी.  इस चुहलबाजी में रिश्ते की मामियां भी पीछे नहीं होती.ये सब उस दौर की बातें हैं जब गांवों में न रेडियों की पहुँच थी और टेलीविजन तो जन्मा ही न था .भाजी तोड़ते समय का ये मनोरंजन अब सुधियों की धरोहर है. भौजियां और मामियां भी बूढ़ी होकर दादियां,नानियाँ बन चुकी हैं लेकिन चने की भाजी का स्वाद शायद ही कोई भूला हो. भाजी तोड़ने में कमर दुःख जाती है और नाखून हा-हां खाने लगते हैं ,देह का पूरा भार घुटनों पर आता है .यानि ये एक तरह की कसरत भी है .भाजी को हासिये से बारीक काटना जिसे बुंदेलखंड  में 'पौलना' कहते हैं सचमुच एक ललित कला है 

मुझे याद है कि  सर्दी के इस मौसम में हम लोग तब तक भाजी खाते थे जब तक की डकार न आ जाये. भाजी भक्षण के बाद सीधे नदी में जाकर लोरना [स्नान करना ] हमारी नित्यक्रिया थी .जब तक भाजी कठोर नहीं हो जाती तब तक ये खाने योग्य रहती है.जैसे ही चने के झाड़ में फूल आने लगते हैं भाजी भंजन का काम बंद हो जाता है .चने की भाजी में पौष्टिकता के सारे तत्व मौजूद रहते हैं,इसलिए घर की बुजुर्ग महिलाएं इस भाजी को धो-काटकर, पहले धूप  में सुखाती हैं और फिर मिटटी के घड़ों में बंद कर मुंह पर कपड़ा बांधकर रख देती हैं. ये सूखी भाजी गर्मियों में दाल के दानों के साथ सालन की तरह पकती है तो रसोई महक से भर जाती है ,मन में चने के खेत फिर लहलहाने लगते हैं .और यही भाजी लू लगने पर तलवों में मली जाती है ,यानी तब ये औषधि बन जाती है .

पचास साल पीछे मुड़कर देखता होऊं तो सब कुछ गायब पाता हूँ.अब न चने की भाजी खोंटने वाले दल दिखाई देते हैं और न उसे खाने की ललक रखने वाले लोग.चने की भाजी अब खोंटने के बजाय उखाड़कर लायी जाती है. बाजार में बिकती है लेकिन उसे खाने में डर लगता है कि  कहीं भाजी रासायनिक खाद और कीटनाशकों से सराबोर न हो .कहने का मतलब अब हम जीवन से ध्वनियों के साथ ही वे स्वाद भी खोते जा रहे हैं जो हमें प्रकृति ने निशुल्क दिए थे .

मै बहुत दिनों बाद बाजार से चने की भाजी लेकर आया तो मुझे ही उसकी सफाई करना पड़ी क्योंकि पत्नी को तो चने खोंटने-खाने का तजुर्बा नहीं है ,गनीमत ये है कि  पत्नी ने मेरी मान से चने की भाजी राँधना सीख लिया था ,यदि ये भी न होता तो चने की भाजी का सेवन तो हो गया होता इतिहास का पन्ना .बच्चे चने की भाजी का स्वाद नहीं जानते.उन्हें चने की भाजी खोंटने का सुख कैसे पता हो सकता है ?आज की पीढ़ी तो चने की भाजी हो या सरसों का साग या पालक-बथुआ तभी खा सकते हैं जब उन्हें कोई फाइव स्टार होटल का रसोइया पाकर टीवी पर दिखाए और उसकी रेसिपी बताये .पहले ये दोनों काम घर की बुजुर्ग महिलाओं के पास था .भाजी राजधने की रेसिपी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक कब हस्तांतरित हो जाती थी किसी को पता ही नहीं चलता था .लेकिन अब सब देव् दुर्लभ है .

मय बदल गया है अब किसान अपने हकों की लड़ाई लड़ता हुआ सर्दियों में खुले आसमान के नीचे राजधानी के बाहर पड़ा है,चने के खेतों की सुध आखिर ले तो कोई कैसे ले .खेतों को अडानी और अम्बानियों की नजर जो लग गयी है .कोई झाड़-फूंक करने वाला भी तो नजर नहीं आ रहा !चने की भाजी के इसी मौसम में बेर,अमरुद और मात्र भी अपने स्वाद मुफ्त में बांटा करती थी.ये सब चीजें अब भी मिलती हैं लेकिन पैसे देकर.मुफ्त का जमाना शायद अब लद गया है. गांवोंमें थोड़ा-बहुत बचा है ,इसलिए मौक़ा निकालिये कभी ,किसी गांव में जरूर जाइये

@ राकेश अचल

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