
इस समय देश समस्याहीन है .तापमान लगातार गिर रहा है. सरकार और सरकारी पार्टी देश भर में किसान सम्मेलन आयोजित करने में व्यस्त है और राष्ट्रद्रोही किसान दिल्ली की देहलीज पर बैठे-बैठे जम रहे हैं .देशवासी नए वर्ष का उत्स मनाने वादियों की और कूच कर चुके हैं .और तो और हमारे देश के गृहमंत्री श्री अमितशाह इतनी फुरसत में हैं कि आधीरात को उठकर बंगाल में अपना जाल लेकर जा पहुंचे हैं.
देश में महंगाई अब कोई मुद्दा है ही नहीं. डीजल,पेट्रोल और रसोई गैस के दामों में लगातार बढ़ोतरी से अब जनमानस आंदोलित नहीं होता.चुपचाप मंगाई की मार सहने की आदत पड़ चुकी है उसे. मंहगाई के खिलाफ चिल्ल-पौं करने वाला समूचा विपक्ष कोमा में है और देश की संसद लगातार स्थगित है. देश को शायद इस समय संसद की आवश्यकता भी नहीं है .संसद का काम सड़क पर हो ही रहा है. सरकार हर मुद्दे का 'वर्चुअल' जबाब दे ही रही है .यानी देश आजकल एक आदर्श स्थिति से गुजर रहा है .सब अपने-अपने काम पर हैं या कहिए लाम पर हैं .
देश के अन्नदाता बेमतलब दिल्ली की देहलीज पर 'पिकनिक' मना रहे हैं .कोई उनसे बात करने आ नहीं रहा,सरकार उन किसानों से बात कर रही है जो उसके अपने हैं,जिनके हाथ में कमलदल के झंडे हैं,बिल्ले हैं,पोस्टर हैं .जिनके हाथ में दूसरे दलों के डंडे-झंडे हैं उन्हें देशद्रोही घोषित किया जा चुका है .देशद्रोही किसानों के लिए कृषि मंत्री खत लिखते हैं और प्रधानमंत्री काले कोस जाकर भाषण देते हैं .बात कोई नहीं करता .किसानों के आंदोलन की परवाह किये बिना देश के गृहमंत्री बंगाल जीतने के लिए अपने घोड़े लेकर कोलकाता के लिए रवानगी डाल चुके हैं .बाबाजी भी किसी भी समय बंगाल जा सकते हैं .
दरअसल देश की सबसे बड़ी समस्या किसान,मजदूर,और कर्मचारी नहीं बल्कि बंगाल की सत्ता है,जिसे हर हाल में इस बार तोड़ककर वहां कमल की खेती करना है .बंगाल में अभी तृणमूल हैं.इन्हें उखाड़ना काँधी छोलने जैसा है .इस काम में हमारे कमल के काश्तकार सिद्ध हस्त हैं .बीते छह साल से वे एक तरह से काँधी ही छोल रहे हैं. काँधी छोलना आज की राजनीति की पहली शर्त है ,जिसे कंधी छोलना नहीं आता वो राजनीति के लायक है ही नहीं .आजकल बंगाल में हमारे सूबे के कैलाश विजयवर्गीय इस कांधीछोल प्रतियोगिता के रेफरी बने हुए हैं .
देश में दशकों तक एकछत्र राज करने वाले लोग कोमा में हैं.वे न बिहार में कामयाब हुए और न बंगाल में कोई उनका नाम लेवा है. सुना है कि श्रीमती सोनिया गांधी एक बार फिर से कोशिश कर रहीं हैं कांग्रेस के जर्जर शरीर में जीवन डालने के लिए .बेचारी सोनिया जी भी आखिर कितनी बार कांग्रेस को नवजीवन दे सकतीं हैं, उनकी भी तो सीमा है,क्षमता है .अब उनकी उम्र भी आड़े आ रही है और सेहत भी साथ नहीं दे रही .उनके सपूत पता नहीं किस खोल में जा छिपे हैं ?
देश ही क्या अब देश के सूबों में भी कुछ हो नहीं रह है. जो हो रहा है सो अपने आप हो रहा है. सरकारें और जनता कुछ नहीं कर रहीं है. सब कोविड के मारे हैं .जो कोविड के मारे नहीं हैं वे बचाव में लगे हैं .हम अपने सूबे मध्यप्रदेश की कहें तो यहां महाराज और शिवराज की स्थापना के बाद सब जगह हर-हर महादेव के स्वर सुनाई देते हैं .प्रदेश में जन सुनवाई बंद है. नेताओं को ही जब नहीं सुना जा रहा है तो जनता किस खेत की मूली है. बेचारे विधायक उपचुनाव की परीक्षा देकर परिणाम हाथ में लिए डोल रहे हैं कोई उन्हें सदन की सदस्य्ता तक नहीं दिला रहा.मंत्रिपद वापस देने की बात तो भूल ही जाइये .
हमारे प्रदेश की सरकार अकेले मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव चलाते हैं. यहां मंत्रिमंडल के सदस्य आपने अपने निर्वाचन क्षेत्रों से बाहर नहीं निकलते. गिने-चुने मंत्री हैं जिन्होंने पूरा मध्यप्रदेश एक मंत्री की हैसियत से देखा-परखा होगा .शेष चार दिन अपने निर्वाचन क्षेत्र में रहते हैं और दो दिन भोपाल में ,बचा एक दिन से आने-जाने में निकल जाता है .सरकार का भरोसा रामजी पर है.हमारे रामराजा ओरछा में बैठे-बैठे ही सबका भला कर रहे हैं .मुमकिन है कि आपने सूबे में स्थिति कमोवेश ऐसी ही हो या फिर इससे बेहतर या बदतर हो .
सच बताऊँ तो अब संकट में तो हम लेखक और पत्रकार भी हैं.हमारे पास भी करने को कुछ बचा नहीं है. बेचारे कब तक अपना काम करें. आखिर विरोध और चाटुकारिता करने की भी तो कोई सीमा होती है भाई .अब समर्थकों और विरोधियों के पास काम करने के लिए कोई मुद्दा नहीं बचा है .गागरोनी गाने की भी एक सीमा होती है .पाठक भी ऊबते दिखाई दे रहे हैं .मै खुद पशोपेश में हूँ कि आने वाले दिनों में किया क्या जाएगा ? मै ऐसे समस्याहीन राष्ट्र में रहने के बजाय अगले माह विदेश यात्रा की तैयारी कर रहा हूँ . सोचता हूँ कि कुछ समय बाल-बच्चों के साथ ही व्यतीत कर लिए जाएँ .
देश में जब दिल्ली ही दिल्ली से जूझ रही हो तब मौन रहना ही श्रेयस्कर है ,केजरीवाल पर राहुलगांधी का असर दिखाई दे रहा है. वे कृषि विधेयकों को विधानसभा में फाड़ रहे हैं,और राहुलगांधी अदृश्य हैं .जैसे प्रधानमंत्री महाबली में किसानों का सामना करने का साहस नहीं है वैसे ही महाबली राहुल गांधी में भी इतनी हिम्मत नहीं है कि वे दिल्ली की दहलीज पर बैठे किसानों के साथ सर्द रातों में जाकर बैठ सकें .ये काम केवल और केवल किसान ही कर सकते हैं,किसी नेता के बूते की ये बात नहीं है ,भले ही उनमें से बहुतों की गर्भनाल खेतों में ही क्यों न दबी पड़ी हो .
पिछले तेईस दिन में जितने आंदोलनकारी किसान सर्दी से मरे हैं उतने लोग शायद दिल्ली में कोरोना से नहीं मरे होंगे लेकिन गरीब किसानों की शाहदत का कोई मोल जैसे ही नहीं .किसानों की शहादत का सम्मान जिस दिन देश में होने लगेगा उस दिन सिंघु सीमा घेरने की नौबत ही नहीं आएगी .शहीद होने वाले किसानों को न कोई सरकार मुआवजा देगी और न कोई पेंशन .किसान मरने के लिए ही पैदा हुआ है ,इसलिए उसका किसी मुआवजे या पेंशन पर कोई हक है ही नहीं .किसान संगठनों को भी इन शहीदों की कोई फ़िक्र नहीं है .जैसे इन अनाम शहादतों के लिए सरकार दोषी है वैसे ही इसके लिए आंदोलन का आवाहन करने वाले संगठन भी जिम्मेदार हैं .किसान संगठनों को चाहिए कि वे शहादत देने वाले किसानों के परिजनो के लिए कम से कम दस हजार रूपये की आर्थिक इमदाद का इंतजाम अवश्य करें .किसान हितैसी राज्य सरकारें भी इन निर्दोष इंसानों के परिजनों के लिए अपनी योजनाओं के दरवाजे खोल सकतीं हैं लेकिन ये कैसे होगा क्योंकि सरकारों ने तो पहले ही किसानों को अपना-पराया बना रखा है .
@ राकेश अचल
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