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Farmers Protest: कृषि कानूनों के विरोध में प्रदर्शन का आज 15वां दिन, सरकार का प्रस्ताव ठुकराया, हाईवे जाम करेंगे किसान
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Farmers Protest: कृषि कानूनों के विरोध में प्रदर्शन का आज 15वां दिन, सरकार का प्रस्ताव ठुकराया, हाईवे जाम करेंगे किसान

नई दिल्ली। केंद्र सरकार के तीन नए कृषि कानूनों के विरोध में किसानों के प्रदर्शन का आज 15वां दिन है। किसान नए कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग कर रहे हैं, जबकि सरकार इन कानूनों में संशोधन करने के पक्ष में है। कई दौर की बैठकें बेनतीजा रहने के बाद किसानों ने सरकार की ओर से भेजे गए प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया है। सरकार के प्रस्ताव को खारिज करने के बाद किसानों ने आंदोलन को और तेज करने की चेतावनी दी है। 

किसानों के प्रस्ताव खारिज करने के बाद गृह मंत्री अमित शाह और कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर के बीच मामले को लेकर करीब ढाई घंटे की मीटिंग चली। बैठक में वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल भी मौजूद थे। मीटिंग में आगे की रणनीति को लेकर चर्चा हुई। बीजेपी ने कृषि कानून में संशोधन को लेकर किसानों को जो प्रस्ताव भेजा था, उसमें 5 मुख्य बातों में बदलाव की बात कही गई थी। सरकार ने MSP जारी रखने, APMC को मजबूत करने, प्राइवेट कंपनियों के रजिस्ट्रेशन की बात कही,  जिस पर किसान संगठनों की बैठक हुई, जिसके बाद किसानों ने प्रस्ताव को खारिज कर दिया।

क्या कहा किसानों ने?
किसानों ने  छह अहम फैसले लिए हैं। किसानों का पहला फैसला ये है कि जब तक तीनों कानून रद्द नहीं होते, आंदोलन नहीं रुकेगा। दूसरा फैसला ये है कि 14 दिसंबर को बड़ा आंदोलन होगा, पूरे देश में धरना देंगे। तीसरा फैसला ये है कि 12 दिसंबर तक जयपुर-दिल्ली हाईवे पूरी तरह बंद करेंगे। चौथा फैसला ये है कि नए कानूनों के खिलाफ देश भर में रोज़ प्रदर्शन जारी रहेंगे। पांचवां फैसला है कि ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को दिल्ली कूच करने को कहा गया है और छठा फैसला ये है कि बीजेपी के विधायक, सांसद और मंत्रियों का घेराव करेंगे, बहिष्कार करेंगे। रिलायंस के प्रोडक्‍ट्स का बहिष्कार करने का ऐलान भी किसानों ने किया है।

क्या कहा था सरकार ने?
बता दें कि किसान आंदोलन के 14वें दिन सिंघु बॉर्डर पर सरकार ने किसानों की सबसे बड़ी मांग में से एक एमएसपी पर लिखित में गारंटी देने का प्रस्ताव भेजा था। प्रस्ताव में केंद्र ने एक लिखित न्यूनतम समर्थन मूल्य आश्वासन और एपीएमसी के लिए एक समान कर के लिए सहमति व्यक्त की है, जो कि राज्य सरकारों द्वारा स्थापित एक विपणन बोर्ड है, जो यह सुनिश्चित करता है कि किसानों का बड़े खुदरा विक्रेताओं की ओर से शोषण न हो। प्रस्ताव में कहा गया है कि निजी व्यापारियों के लिए व्यापार करने को लेकर पंजीकरण का प्रावधान होगा।

कृषि कानूनों को खत्म करने के मुद्दे पर, सरकार ने कहा कि वह उन कानूनों के प्रावधानों पर विचार करने के लिए तैयार है, जिन पर किसानों ने आपत्तियां जताई हैं। व्यापारियों के पंजीकरण के मुद्दे पर, सरकार ने नए नियमों को लागू करने का आश्वासन दिया है, जिसके तहत राज्य सरकारों को किसानों के कल्याण के लिए नए नियमों के साथ आने के लिए अधिकार दिए जाएंगे।

सरकार ने किसानों के बीच इस आशंका को भी दूर करने का प्रयास किया है कि उनकी खेती उनसे छिन जाएगी। सरकार ने ऐसी कोई कार्रवाई नहीं करने की बात सुनिश्चित की है। सरकार के प्रस्ताव ने स्पष्ट किया कि नए कानूनों में प्रावधान बहुत स्पष्ट हैं और अगर किसानों को अभी भी इस मुद्दे पर कोई भ्रम रहेगा, तो उन्हें और भी स्पष्ट तरीके से समझाया जाएगा।

सरकार ने एपीएमसी अधिनियम पर उस गलत धारणा को भी खारिज किया, जिसमें कहा जा रहा है कि किसान निजी मंडियों के चंगुल में फंस जाएंगे। सरकार ने एक संशोधन प्रस्तावित किया, जिसमें एक प्रावधान होगा कि राज्य सरकारें निजी मंडियों के लिए पंजीकरण नियम लागू कर सकती हैं। इसमें यह भी प्रावधान होगा कि राज्य सरकारें निजी और साथ ही एपीएमसी मंडियों में भी उपकर शुल्क की समान दर सुनिश्चित कर सकती हैं।

सरकार के प्रस्ताव में उस आरोप को भी खारिज कर दिया गया, जिसमें दावा किया जा रहा था कि बड़े उद्योगपति किसानों की जमीन पर कब्जा कर लेंगे और किसान भूमिहीन हो जाएंगे। सरकार ने यह भी कहा कि दीवानी अदालतों (सिविल कोर्ट) से संपर्क करने वालों को अब अनुमति दी जाएगी। विद्युत संशोधन अधिनियम 2020 पर, सरकार ने आश्वासन दिया है कि अधिनियम को लागू नहीं किया जाएगा और पहले की प्रक्रिया को यथास्थिति बनाए रखा जाएगा। पराली जलाने वाले मुद्दे पर सरकार ने कहा है कि वह इस विषय पर एक उचित व्यवस्था के साथ सामने आएगी।

किसान हालांकि इन कानूनों को पूरी तरह से वापस लेने की मांग कर रहे हैं। यही वजह है कि उन्होंने सरकार की ओर से भेजे गए प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया है। एक दिन पहले केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के साथ हुई किसान प्रतिनिधियों की बैठक के बाद किसानों को यह प्रस्ताव भेजा गया था। दोनों पक्षों की ओर से अपने मुद्दों पर अड़े रहने के कारण अब तक हुई सरकार-किसान वार्ता के पांच दौर बेनतीजा रहे हैं।

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