
नई दिल्ली, 3 दिसंबर, न्यूज़ मंच, साल 2014 में सत्ता में आने के बाद से ही मोदी सरकार मेक इन इंडिया को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। इसके तहत अलग-अलग सेक्टर में घरेलू प्रोडक्ट को बढ़ावा देने के लिए कई बड़े फैसले भी लिए गए हैं। अब एक फैसला दवाइयों पर लिया गया है। केंद्र सरकार ने दवाइयों की सार्वजनिक खरीद में घरेलू स्तर पर उत्पादित दवाओं को तरजीह देने की घोषणा की है।
चालू वित्त वर्ष के दौरान दवाइयों की सरकारी खरीद में कम से कम 75 फीसदी की खरीद लोकल कंपोनेंट (स्थानीय अवयव) वाली दवाओं की दी जाएगी जबकि 2023-25 तक इसे बढ़ाकर 90 फीसदी किया जाएगा। इस संबंध में औषधि विभाग ने जानकारी दी है।
क्यों लिया गया फैसला
विभाग ने कहा कि यह देश में दवा क्षेत्र में ‘मेक इन इंडिया’को बढ़ावा देने की कोशिश है। इसके साथ ही जिन दवाओं का निर्माण भारत में नहीं होता है, उनमें भी कम से कम 10 फीसदी स्थानीय अवयव होने चाहिए। इसका असर ये होगा कि आप देश के बने लोकल कंपोनेंट का इस्तेमाल कर सकेंगे। इसके अलावा लोकल फार्मा कंपनियों को भी कारोबार बढ़ाने में मदद मिलेगी। औषधि विभाग ने एक आदेश में कहा कि बाद में ऐसी दवाओं में स्थानीय अवयवों को बढ़ाकर 2019-21 में 15 फीसदी, 2021-23 में 20 फीसदी और 2023-25 तक 30 फीसदी किया जाएगा। यानी 2023-25 तक जिन दवाओं को भारत में तैयार नहीं किया जाता है उनकी सरकारी खरीद तभी होगी जब उनमें 30 फीसदी स्थानीय अवयव होंगे।
औषधि विभाग को नोडल एजेंसी बनाया
इसी तरह भारत में तैयार की गई दवाओं की चालू वित्त वर्ष में सरकारी खरीद तब ही होगी जब उनमें कम से कम 75 फीसदी स्थानीय अवयव होंगे। 2019-21 में यह 80 फीसदी, 2021-23 में 85 फीसदी और 2023-25 तक 90 फीसदी तक बढ़ाया जाएगा। बता दें कि दवा क्षेत्र में मेक इन इंडिया को बढ़ावा देने के लिए औद्योगिक नीति एवं संवर्द्धन विभाग ने औषधि विभाग को नोडल एजेंसी बनाया है।
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