
नई दिल्ली, 3 दिसंबर, न्यूज़ मंच, राम मंदिर-बाबरी मस्जिद मामले में सुप्रीम कोर्ट में चल रहे विवाद में शिया वक्फ बोर्ड का पक्ष दो अधिवक्ता रखेंगे। बोर्ड अध्यक्ष सैयद वसीम रिजवी ने कहा कि राम मंदिर के पक्ष में विवाद को खत्म किए जाने में शिया वक्फ बोर्ड की अहम भूमिका कोर्ट में सुनवाई के दौरान रहेगी। उच्चतम न्यायालय में अधिवक्ता एमसी धींगरा व वरिष्ठ अधिवक्ता एसपी सिंह वक्फ बोर्ड का पक्ष रखेंगे। जरूरत पड़ने पर बोर्ड किसी अन्य अधिवक्ता को भी न्यायालय में उपस्थित कर सकता है।
रिजवी ने आरोप लगाया कि 2 फरवरी, 1944 में सुन्नी वक्फ बोर्ड ने एक विधि विपरीत अधिसूचना जारी करके बाबरी मस्जिद को सुन्नी वक्फ घोषित किया था। उन्होंने दावा किया कि बाबरी मस्जिद का निर्माण मीर बाकी ने करवाया था जो शिया मुसलमान था। इस वजह से शिया वक्फ बोर्ड का पक्ष सुप्रीम कोर्ट में मजबूत है। रिजवी ने कहा कि शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड की ओर से सुप्रीम कोर्ट में शपथ पत्र के साथ कहा जा चुका है कि बोर्ड विवादित भूमि पर राम मंदिर बनने के समर्थन में है। वह उक्त भूमि का एक भी हिस्सा मस्जिद निर्माण के लिए नहीं लेना चाहता।
उत्तर प्रदेश शिया वक्फ बोर्ड ने 13 जुलाई 2018 को सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि वह अयोध्या विवाद को शांतिपूर्ण तरीके से निपटाना चाहता है और राम मंदिर निर्माण के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा मुसलमानों को दी गई एक तिहाई जमीन हिंदुओं को दान करने के लिए तैयार है। शिया वक्फ बोर्ड ने कहा कि, बाबरी मस्जिद का संरक्षक शिया था और सुन्नी वक्फ बोर्ड या कोई और भारत में मुसलमानों का प्रतिनिधि नहीं है।
वहीं इसी सुनवाई के दौरान सुन्नी वक्फ बोर्ड ने कहा कि, शिया बोर्ड एक अस्तित्वहीन दान करना चाहता है। “शिया वक्फ बोर्ड के पास इस मामले में बोलने का कोई अधिकार नहीं है। जिस तरह तालिबान ने बामियान को नष्ट किया, उसी तरह 'हिंदू तालिबान' ने बाबरी मस्जिद को नष्ट कर दिया, ”वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने कहा था।
बातचीत से हल हो सकता था पूरा मामला
शिया वक्फ बोर्ड सुप्रीम कोर्ट में लंबित इस प्रकरण में प्रतिवादी है। चूंकि मुकदमा सुन्नी वक्फ बोर्ड लड़ रहा था, इसलिए शिया वक्फ बोर्ड ने अपना पक्ष कभी कोर्ट में नहीं रखा, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि शिया बोर्ड अब मुकदमे में अपना पक्ष नहीं रख सकता। रिजवी ने कहा, सुन्नी बोर्ड व मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड बेवजह माहौल खराब कर रहे जबकि पूरा मामला बातचीत से तय हो सकता था।
क्या है 'मंदिर-मस्जिद विवाद' या 'अयोध्या विवाद'
बाबरी मस्जिद भारत के वर्तमान अयोध्या जिले में स्थित थी। यह उत्तर प्रदेश राज्य की सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक थी। 1940 से पहले, मस्जिद को आधिकारिक तौर पर मस्जिद-ए-जन्मस्थान ("जन्मस्थान की मस्जिद") के रूप में जाना जाता था। मस्जिद के शिलालेखों के अनुसार, इसे मुगल सम्राट बाबर (जिसके नाम पर रखा गया है) के आदेश पर 1528-29 (935 AH) में मीर बाक़ी ने बनवाया था।
मस्जिद एक पहाड़ी पर स्थित थी, जिसे रामकोट ("राम का किला") के नाम से जाना जाता था। कहा जाता है कि, मीर बाकी ने इस स्थल पर पहले से मौजूद राम मंदिर को नष्ट कर दिया था। इसे साबित करने के लिए सीमित ऐतिहासिक साक्ष्य मौजूद हैं, और इस वजह से यहाँ पर मंदिर का अस्तित्व विवाद का विषय है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की एक रिपोर्ट के अनुसार एक मंदिर इस स्थल पर मौजूद था।
साइट के इतिहास पर राजनीतिक, ऐतिहासिक सामाजिक और धार्मिक बहस वर्षों से होती आ रही है और तर्क है कि मस्जिद बनाने के लिए पहले से मौजूद राम मंदिर को ध्वस्त किया गया। इसी 'मंदिर-मस्जिद विवाद' को 'अयोध्या विवाद' के रूप में जाना जाता है।
19 वीं शताब्दी में, मस्जिद को लेकर हिंदू और मुसलमानों के बीच कई विवाद हुए। लेकिन 6 दिसंबर 1992 को, हिंदू राष्ट्रवादी समूहों द्वारा बाबरी मस्जिद के विध्वंस ने पूरे भारत में दंगे भड़काए, लगभग 2,000 लोग मारे गए, जिनमें से कई मुस्लिम थे।
430 साल बाद अदालत पहुंचा यह मामला
शिया वक्फ बोर्ड ने पहले ही विवादित भूमि पर राम मंदिर बनने के पक्ष में है। उसने कहा कि विवादित भूमि का कोई हिस्सा मस्जिद बनाने के लिए नहीं चाहिए। शिया वक्फ बोर्ड के अंसारी ने कहा कि सुन्नी वक्फ बोर्ड व ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इस मसले पर बेवजह माहौल बिगाड़ने में लगे हैं। उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट जिस मामले की सुनवाई करने जा रहा है उसकी जड़ें 490 वर्ष पुरानी हैं। विवाद की नींव 1528 में पड़ी। हालांकि इस विवाद को कोर्ट तक पहुंचने में 430 साल का समय लग गया।
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