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पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती पर विशेष - समर्थक ही नहीं, विरोधी भी करते थे प्रशंसा, ऐसे थे पूर्व पीएम वाजपेयी
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पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती पर विशेष - समर्थक ही नहीं, विरोधी भी करते थे प्रशंसा, ऐसे थे पूर्व पीएम वाजपेयी

नई दिल्ली, 25 दिसंबर, न्यूज़ मंच, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की आज 95 वीं जयंती है। उनका जन्म 25 दिसंबर, 1924 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में हुआ था। वाजपेयी का निधन 16 अगस्त 2018 को नई दिल्ली के एम्स अस्पताल में हुआ था। अटल बिहारी वाजपेयी मृत्यु के काफी से बीमार थे। बीमारी की वजह से सन 2009 के बाद से उनका राजनीतिक जीवन पूरी तरह से खत्म हो गया था। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी असम के डिब्रूगढ़ में सबसे लंबा रेलवे-रोड ब्रिज देश को समर्पित करने वाले हैं। इसके अलावा देश के अलग-अलग हिस्सों में सुशासन दिवस के रूप में अटल की जयंती का आयोजन किया जा रहा है। 
राजधानी दिल्ली में 'सदैव अटल' स्मृति स्थल पर विशेष कार्यक्रम कर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को श्रद्धांजलि दी जा रही है। इस दौरान राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अलावा बड़ी संख्या में लोगों ने श्रद्धांजलि दी। श्रद्धांजलि समारोह में पंकज उधास ने भजन गाया। अटल को श्रद्धांजलि देने उनकी मुंहबोली बेटी नमिता भट्टाचार्य भी पहुंची थीं। उन्होंने पुष्पार्पण कर श्रद्धांजलि दी। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, लालकृष्ण आडवाणी और कैबिनेट के कई मंत्री भी यहां मौजूद रहे। इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ट्वीट कर अटल बिहारी वाजयेपी को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने एक वीडियो जारी कर अटल की तस्वीरें, उनकी व्यक्तित्व की खासियतें और उनके सुदीर्घ राजनीतिक जीवन की बात की। 

लखनऊ में भी हुआ विशेष कार्यक्रम
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ अटल बिहारी वाजपेयी का संसदीय क्षेत्र और कर्मभूमि रही है। यहां उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा विशेष श्रद्धांजलि कार्यक्रम का आयोजन किया किया गया है। इस कार्यक्रम में गृहमंत्री राजनाथ सिंह, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, राज्यपाल राम नाईक, उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा समेत अन्य नेता मौजूद रहे। 

भारत सरकार ने जारी किया सिक्का
वाजपेयी की जयंती के एक दिन पूर्व भारत सरकार द्वारा उनके सम्मान में 100 रुपये का स्मारक सिक्का जारी किया गया। इस सिक्के का भार 35 ग्राम है, जिस पर अटल बिहारी वाजपेयी का चित्र बना है। सिक्के पर अंग्रेजी और हिन्दी में वाजेपयी का नाम, जन्मतिथि और निधन का दिन अंकित किया गया है। सिक्के के पिछली तरफ अशोक स्तंभ पर सिंह चर्तुभुज के साथ सत्यमेव जयते भी बनाया गया है। 

इन पांच फैसलों के लिए याद किए जाएंगे अटल 
पूर्व प्रधानमत्री अटल बिहारी वाजपेयी सर्वसमावेशी विचारधारा के हामी थे लेकिन उन्होंने अपने सियासी सफर में कई बड़े और सख्त फैसले भी लिए हैं। इस फैसलों के लिए देश उनको हमेशा याद रखेगा। पाकिस्तान समेत पूरी दुनिया के भारी विरोध के बाद किए गए पोखरण में परमाणु विस्फोट से लेकिन सर्वर्णिम चर्तुभुज योजना तक उनकी कई योजनाएं हमेशा याद की जाएंगी, जिन्होंने देश की तस्वीर को बदल दिया। राजनीतिक जिंदगी में उन्होंने बीजेपी की नींव रखने के बाद उसे शिखर तक पहुंचाने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई। 

स्वर्णिम चतुर्भुज योजना
अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री रहते हुए एक शहर को दूसरे शहर से जोड़ने के लिए स्वर्ण‍िम चतुर्भुज योजना की शुरुआत की थी। स्वर्ण‍िम चतुर्भुज योजना के तहत चेन्नई, कोलकाता, दिल्ली और मुंबई को हाइवेज के नेटवर्क से जोड़ने में मदद की। देश भर में आज एक्सप्रेस-वे बनाए जाए रहे हैं। वहीं, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना ने देश के दूर-दराज इलाकों में बसे गांवों को सड़क से जोड़ने का काम किया।

पोखरण में परमाणु परीक्षण
अटल बिहारी वाजपेयी के सबसे कड़े और ऐतिहासिक फैसलों में से एक है पोखरण परमाणु परीक्षण। वाजपेयी ने 1998 में पोखरण में 2 दिन के अंतराल में 5 परमाणु परीक्षण करके सारी दुनिया को चौंका दिया था। इसके बाद दुनियाभर के तमाम देश भारत के विरोध में खड़े हो गए थे। अमेरिका सहित कई देशों में आर्थिक पाबंदी लगा दी। इतना ही नहीं, देश में विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार को घेरने में जुटा था। देश की आर्थिक हालत बिगड़ गई थी, लेकिन आज दुनिया के सामने भारत एक मजबूत और परमाणु संपन्न देशों में से एक है।

सर्व शिक्षा अभियान
अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के सबसे सफल सामाजिक अभ‍ियानों में से एक था सर्व श‍िक्षा अभ‍ियान। इसके जरिए इस सरकार ने 6 से 14 साल की उम्र के बच्चों को मुफ्त प्राथमिक श‍िक्षा देने का प्रावधान किया था। इसी योजना का परिणाम था कि 2001 में लॉन्च हुई इस योजना के जरिए गांव-गांव स्कूल खोले गए।

मुशर्रफ को भारत बुलाना
वाजपेयी ने पाकिस्तान के रिश्ते को पटरी पर लाने के लिए हरसंभव कोशिश की थी। दिल्ली-लाहौर के बीच 1999 में बस सेवा शुरू की। इतना ही नहीं, करगिल में आतंकियों की घुसपैठ के बाद जुलाई 2001 में पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के साथ आगरा में शिखर बैठक करने का फैसला वाजपेयी का काफी मुश्किल भरा कदम था। हालांकि, यह बैठक बेनतीजा निकली और दोनों देशों के रिश्तों में और भी तल्खी आ गई थी।  बैठक के पांच महीने के बाद ही भारतीय संसद पर आतंकियों ने हमला कर दिया था, इससे वाजपेयी सरकार की काफी किरकिरी हुई।

कंधार में आतंकियों को छोड़ना
वाजपेयी सरकार में आतंकियों ने 24 दिसंबर, 1999 को इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट आईसी-814 को हाईजैक कर लिया था। इसमें 176 यात्री और 15 क्रू मेंबर्स सवार थे। आतंकियों ने शुरू में भारतीय जेलों में बंद 35 उग्रवादियों की रिहाई और 200 मिलियन अमेरिकी डॉलर की मांग की। सरकार इस पर राजी नहीं हुई और बाद में तीन आतंकियों को छोड़ने पर सहमति बनी। वाजपेयी सरकार के विदेश मंत्री रहे जसवंत सिंह खुद ही आतंकी मसूद अजहर, अहमद ज़रगर और शेख अहमद उमर सईद को लेकर गए और रिहा किया इसके बाद प्लेन को छोड़ा गया। इस फैसले को लेकर आज तक उनकी आलोचना की जाती है।

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