
नई दिल्ली। भारत 21 अक्टूबर को उन बहादुर पुलिसकर्मियों को याद कर रहा है, जिन्होंने देश सेवा में अपने प्राणों की आहुति दी थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'पुलिस स्मृति दिवस' पर केंद्रीय रिजर्व पुलिस फोर्स (सीआरपीएफ) को बधाई दी है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नेशनल पुलिस मेमोरियल जाकर बहादुर जवानों को श्रद्धांजलि अर्पित की। पीएम मोदी ने अपने बधाई संदेश में सीआरपीएफ केा 'बेहतरीन फोर्स' बताया और कहा कि इसकी बहादुरी और प्रोफेशनलिज्म को सब सराहते हैं।
शाह ने कोविड-19 महामारी के वक्त सीआरपीएफ की मुस्तैदी के लिए फोर्स का शुक्रिया अदा किया। हर साल 21 अक्टूबर को देश उन 10 रणबांकुरों को याद करता है जिन्होंने 1959 में शहादत दी थी। आइए जानते हैं उस दिन क्या हुआ था। लद्दाख का हॉट स्प्रिंग्स इलाका पिछले दिनों भारत-चीन तनाव के केंद्र में रहा है। पुलिस स्मृति दिवस' मनाने की प्रेरणा यहीं से मिली। 21 अक्टूबर, 1959 का दिन था। लद्दाख के इस इलाके में भारी ठंड पड़ रही थी।
भारत और चीन के बीच तनाव बढ़ता जा रहा था। 20 अक्टूबर, 1959 को कोंगका ला के पास सीआरपीएफ के तीन पैट्रोल ऑफिसर्स को चीन ने हिरासत में ले लिया था। अगले दिन उनकी तलाश में एक बड़ी टीम गई जिसपर चीन ने हमला कर दिया। चीनी ऊंचाइयों पर मौजूद थे और लगातार फायर करते जा रहे थे। भारतीय जवानों के पास छिपने की जगह नहीं थी। उनमें से 10 ने वहीं पर शहादत दी जबकि सात को चीन ने बंदी बना लिया था। यह घटना भारत-चीन के सैन्य इतिहास में एक ट्रिगर पॉइंट की तरह देखी जाती है। इसके बाद, दोनों देशों के रिश्ते खासे बिगड़ गए थे। नवंबर में, चीनी बॉर्डर गार्ड्स ने शहीदों के शवों, बंदी बनाए गए सीआरपीएफ जवानों को वापस कर दिया था।
जनवरी 1960 में सभी राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के पुलिस महानिरीक्षकों की सालाना कॉन्फ्रेंस में तय हुआ कि सीआरपीएफ जवानों की शहादत भुलाई नहीं जाएगी। 21 अक्टूबर के दिन को 'पुलिस स्मृति दिवस' के रूप में मनाने का फैसला हुआ। तब से हर साल देश उन 10 शहीदों को याद करता है जो चीनी आक्रमण का शिकार हुए। 2012 के बाद से दिल्ली के चाणक्यपुरी में स्थित नैशनल पुलिस मेमोरियल पर हर साल परेड होती है। साल 1961 के बाद से, 33,000 से ज्यादा पुलिसकर्मियों ने ड्यूटी करते हुए अपनी जिंदगी कुर्बान की है।
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