
कोलकाता, 3 जनवरी, न्यूज़ मंच, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए बीता साल 2018 मिला-जुला रहा है। एक ओर देश की राजनीति में उनकी सक्रियता बढ़ी तो दूसरी ओर उनके अपने राज्य में उनकी चमक भाजपा के उत्थान के बाद थोड़ी फीकी पड़ी है। अब ममता बैनर्जी ने अपना ध्यान अगले कुछ महीनों में होने वाले लोकसभा चुनाव में किंगमेकर की भूमिका निभाने पर केंद्रित हो गया है।
ममता ने हासिल किया बड़ा सियासी कद
2014 में भाजपा की जीत के बाद जहां ज्यादातर क्षेत्रीय पार्टियां हाशिए पर आ गई थीं, वहीं ममता ने इस ट्रेंड को पीछे छोड़ते हुए अपनी सीमाओं में एक कद्दावर नेता के रूप में उभरीं, जिसने भाजपा की नीतियों का लगातार विरोध किया। उन्होंने नोटबंदी को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की खुलकर आलोचना की, जिसके बाद ममता विपक्ष के गठबंधन की अग्रणी नेता बन गईं।
किंगमेकर की भूमिका
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि सन 2019 में अगर भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए और कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूपीए बहुमत लाने से चूक गया, तो ममता किंगमेकर की भूमिका निभा सकती हैं। कलकत्ता रिसर्च ग्रुप के प्रोफेसर रणबीर समद्दर का मानना है कि आगामी 2019 लोकसभा चुनाव क्षेत्रीय पार्टियों के लिए प्राइम टाइम साबित हो सकता है। इस बार 2014 जैसे एकतरफा परिणामों की बेहद अल्प गुंजाइश की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने कहा ममता मानती हैं कि वह आने वाले चुनाव में तुरुप का इक्का साबित हो सकती हैं।
विपक्षी नेता लेते हैं सलाह
2018 पर नजर डालें तो ममता बनर्जी खुद को राष्ट्रीय राजनीति में काफी कुछ स्थापित कर चुकी हैं। विपक्षी नेताओं से मुलाकात के लिए दिल्ली दौरे से लेकर, कर्नाटक में जेडी(एस) नेता एचडी कुमारस्वामी को समर्थन देकर, एसपी अध्यक्ष अखिलेश यादव को यूपी उपचुनाव में अपनी कड़ी प्रतिद्वंद्वी बीएसपी मुखिया मायावती के साथ आने की सलाह देकर ममता ने विपक्षी एकता में महत्वपूर्ण किरदार निभाया है।
कर्टनाक में सरकार बनाने में निभाई भूमिका
वह ममता ही थीं जिन्होंने कर्नाटक में भाजपा के बहुमत का आंकड़ा न छू पाने पर कांग्रेस के साथ संयुक्त रूप से हिस्सेदारी के लिए जेडी(एस) को मनाया। इसके बाद ही किंगमेकर बनने की इच्छा रखने वाले एन चंद्रबाबू नायडू और के चंद्रशेखर राव (केसीआर) ने उनसे समर्थन प्राप्त करने की कोशिशें तेज कर दीं हैं।
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