
नई दिल्ली, 9 जनवरी, न्यूज़ मंच, आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग को शिक्षा और नौकरियों में 10 प्रतिशत आरक्षण के लिए संविधान संशोधन बिल मंगलवार को लोकसभा से पास हो गया है। इस बिल को बुधवार को राज्यसभा में पेश किया गया।
कैसे होता है संविधान में संशोधन
भारत के संविधान के भाग XX में अनुच्छेद 368 है, जो संविधान के संशोधन से संबंधित है। इस अनुच्छेद के अनुसार, संसद इस संविधान में संशोधन के लिए निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार, संविधान के किसी भी प्रावधान को जोड़ सकती है, उसमें संशोधन या उसे निरस्त कर सकती है। हालाँकि, केशवनंद भारती केस 1973 में, सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया है कि, संसद उन प्रावधानों में संशोधन नहीं कर सकती है, जो संविधान की मूल संरचना का गठन करते हैं।
संविधान के संशोधन की प्रक्रिया का उल्लेख अनुच्छेद 368 के तहत दो तरीकों से किया गया है। एक, संसद के प्रत्येक सदन में विशेष बहुमत से और दूसरे में संसद के विशेष बहुमत के साथ आधे राज्यों के अनुसमर्थन द्वारा।
इसका मतलब है कि संविधान में संशोधन तब किया जा सकता है, जब या तो बिल विशेष बहुमत से, यानि दो तिहाई से प्रत्येक सदन में पास हो, या विशेष बहुमत के साथ साथ आधे राज्यों के अनुसमर्थन के साथ पास हो। इसका मतलब है, अनुच्छेद 368 में उल्लिखित प्रावधानों में कोई बदलाव करने या केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों के वितरण से संबंधित अधिकार को संशोधित करने के लिए, बिल को कम से कम 1/2 राज्यों की विधानसभाओं द्वारा अनुमोदित किया जाना चाहिए।
इसमें, निम्न बातें ध्यान रखने योग्य हैं:
1. संसद के किसी भी सदन में संविधान संशोधन विधेयक पेश किया जा सकता है। लेकिन संसद के पास ‘संविधान के बुनियादी ढांचे’ में संशोधन करने की कोई शक्ति नहीं है।
2. संविधान संशोधन के उद्देश्य से विधेयक किसी राज्य विधायिका में पहले प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है। भारत एक संघीय राज्य होने के बावजूद, संविधान में संशोधन के लिए पहल केवल संसद द्वारा ही की जा सकती है। राज्य विधानसभाओं के पास संशोधन की शुरुआत करने की कोई शक्ति नहीं है।
3 . संविधान में संशोधन के लिए राष्ट्रपति की अध्यादेश बनाने की शक्ति का उपयोग नहीं किया जा सकता है। इसे राष्ट्रपति से पूर्व अनुमोदन की भी आवश्यकता नहीं है।
4. कोई भी सांसद संशोधन विधेयक ला सकता है। संविधान संशोधन विधेयक को सरकारी विधेयक या निजी सदस्य विधेयक दोनों के रूप में पेश किया जा सकता है। हालाँकि, यदि यह एक निजी सदस्य है, तो इसे पहले स्तर पर जांचना होगा और इसे संसद की बिज़नेस लिस्ट में शामिल करने से पहले निजी सदस्यों के विधेयकों और प्रस्तावों पर समिति द्वारा पेश करने की सिफारिश की जाएगी।
5. संविधान संशोधन बिल पेश करने में राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश की आवश्यकता नहीं है।
6. संविधान संशोधन बिल को मनी बिल या वित्तीय बिल के रूप में नहीं माना जाता है, हालाँकि उनमे इनसे संबंधित कुछ प्रावधान होते हैं।
7. संविधान संशोधन बिल को दोनों सदनों में पूर्ण बहुमत + विशेष बहुमत से अलग अलग पास होना चाहिए {पूर्ण बहुमत → 50% से अधिक सदस्य; विशेष बहुमत → 2/3 सदस्य उपस्थित और वोटिंग}।
8. यदि संविधान संशोधन बिल पर दोनों सदनों के बीच मतभेद है, तो गतिरोध को हल करने के लिए संयुक्त बैठक का कोई प्रावधान नहीं है।
9. जिन विधेयकों के परिणामस्वरूप संविधान में कुछ बदलाव होते हैं, लेकिन साधारण बहुमत से पारित होते हैं उन्हें संविधान संशोधन नहीं माना जाता है।
10. यदि कोई विधेयक संविधान के संघीय प्रावधानों में संशोधन करना चाहता है, तो उसे साधारण बहुमत से आधे राज्यों के विधानसभाओं द्वारा भी पुष्टि करनी चाहिए।
11. दोनों सदनों में बिल पास होने के बाद, बिल को मंजूरी के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। 1971 के 24 वें संशोधन अधिनियम ने राष्ट्रपति के लिए एक संवैधानिक संशोधन विधेयक को अपनी सहमति देना अनिवार्य कर दिया था। इस प्रकार, एक संविधान संशोधन बिल के लिए, राष्ट्रपति न तो अपनी सहमति को वापस ले सकता है, और न ही पुनर्विचार के लिए बिल वापस कर सकता है।
इसी प्रक्रिया के तहत, 124वां संविधान संशोधन बिल मंगलवार को लोक सभा में पेश किया गया और 323 सदस्यों की सहमति के साथ लोक सभा में पास भी हो गया। लोकसभा में इस बिल का पास होना बड़ी बात नहीं थी, क्योंकि निचले सदन में भाजपा बहुमत में है। केंद्र सरकार की असली परीक्षा उच्च सदन यानी राज्यसभा में होने वाली है, जहां राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) अल्पमत में है।
एससी-एसटी या पिछड़े वर्ग के लोगों को कोई नुकसान नहीं : थावरचंद गहलोत
राज्यसभा में सरकार का पक्ष रखते हुए थावरचंद गहलोत ने कहा, इस बिल का हम जल्दबाजी में लेकर नहीं आए हैं। हम इसे अच्छी तरह से सोच समझकर और अच्छे इरादे के साथ लेकर आए हैं। इससे उन लोगों को फायदा मिलेगा जिनकी शिकायत रहती थी कि क्या सामान्य वर्ग में पैदा होना गुनाह है।
थावरचंद गहलोत ने कहा कि मैं आप सभी लोगों को आश्वस्त करना चाहता हूं कि इस बिल से एससी-एसटी या पिछड़े वर्ग के लोगों को कोई नुकसान नहीं होगा। इस बिल के द्वारा हम सामान्य वर्ग के गरीबों की मदद करना चाहते हैं। इस बिल के आने से समाज में समरसता बढ़ेगी। इस बिल को हम नेक इरादे से लाए हैं और सभी दलों से सहयोग करने का अनुरोध करता हूं।
हंगामे के बीच कार्यवाही को दोपहर 2 बजे तक स्थगित की गयी
यह बिल जैसे ही सदन में पेश हुआ सदस्यगणों ने इसे एकांगी और गलत समय पर पेश किया गया बताते हुए हंगामा करने लगे। जनरल कोटा बिल पर राज्य सभा में चर्चा के लिए निर्धारित समय को लेकर भी सदन में हंगामा हुआ। पहले इस बिल पर चर्चा के लिए 3 घंटे का समय निर्धारित किया गया था, लेकिन पक्ष-विपक्ष के सदस्यों से बातचीत के आधार पर चर्चा के लिए 8 घंटे का समय तय किया गया। विपक्षी सांसद लगातार हंगामा और नारेबाजी करते रहे। हंगामे की वजह से उपसभापति हरिवंश ने सदन की कार्यवाही को दोपहर 2 बजे तक के लिए स्थगित कर दिया।
विपक्षी दलों ने की बैठक
राज्यसभा में अपनी रणनीति को लेकर विपक्षी दलों ने संसद परिसर में आज एक अहम बैठक की है। खास बात यह है कि अगर इस 124वें संविधान संशोधन विधेयक को आज राज्यसभा की मंजूरी मिल गई, तो राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के साथ ही सामान्य वर्ग के गरीबों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण तत्काल प्रभाव से लागू हो जाएगा। इसके लिए आधे से ज्यादा राज्यों की विधानसभा से मंजूरी की जरूरत नहीं पड़ेगी।
राज्यसभा में होगी असली परीक्षा
लोकसभा में इस बिल को पास कराने में सरकार को कोई परेशानी नहीं हुई। उपस्थित 326 सदस्यों में से 323 ने बिल के समर्थन में मतदान किया। केवल 3 सदस्यों ने ही इसके विरोध में मतदान किया। सरकार की असली परीक्षा राज्यसभा में है, क्योंकि यहां उपस्थित सदस्यों में से दो-तिहाई का समर्थन पाना आसान नहीं है। राज्यसभा में 246 सदस्य हैं और अगर सभी सदस्य वोटिंग में हिस्सा लेते हैं तो बिल पास होने के लिए 164 वोटों की जरूरत पड़ेगी। विपक्ष यहां अपने दबदबे का इस्तेमाल करेगा।
123 सदस्यों की मौजूदगी जरूरी
राज्यसभा में कुल 246 सदस्य हैं। बिल को पास करने के लिए कम से कम दो-तिहाई वोट की जरूरत है। इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि मतदान में कम से कम आधे सदस्य मौजूद रहें, यानी कम से कम 123 सदस्यों का मतदान में हिस्सा लेना जरूरी है।
कांग्रेस का बदल सकता है रुख
कांग्रेस ने भले ही इस बिल का समर्थन किया है, लेकिन उसने लोकसभा में बहस के दौरान बिल को सेलेक्ट कमेटी को भेजने की मांग की थी। ऐसे में बिल पर राज्यसभा में कांग्रेस का रुख बदल जाए तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी। पार्टी राज्य सभा में अपने दबदबे का इस्तेमाल इस विधेयक को सेलेक्ट कमेटी को भेजे जाने के लिए कर सकती है। इसके अलावा डीएमके, एआईएडीएमके, समाजवादी पार्टी और दूसरे विपक्षी दल भी विरोध कर सकते हैं।
पास हुआ तो जरूरी नहीं होगी राज्यों की मंजूरी
वित्तमंत्री अरुण जेटली ने लोकसभा में मंगलवार को बताया था कि क्यों संविधान संशोधन बिल होने के बावजूद इसे राज्यों की मंजूरी की जरूरत नहीं होगी। दरअसल, यह संविधान संशोधन दूसरे संविधान संशोधनों से अलग है। संविधान के आर्टिकल 15 और 16 में संशोधन करके नया क्लॉज जोड़ा गया है, लिहाजा दोनों सदनों से पारित होने के साथ ही यह तत्काल प्रभावी हो जाएगा। इससे पहले संविधान संशोधन बिल को दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से पास कराने के साथ-साथ कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं से भी मंजूरी चाहिए होती है।
50 फीसदी से बाहर है तो भी नहीं होगी दिक्कत
बहस के दौरान विपक्षी सदस्यों ने यह भी सवाल उठाया कि सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 प्रतिशत तय की है। 10 प्रतिशत जनरल कोटा के साथ यह 59.5 प्रतिशत हो जाएगा, लिहाजा यह सुप्रीम कोर्ट में नहीं टिकेगा। विपक्ष की इस शंका को निराधार बताते हुए अरुण जेटली ने कहा मंगलवार को बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा एससी-एसटी और ओबीसी वर्ग को लेकर तय की है। इससे पहले, जनरल कोटा की कोशिशें कोर्ट में इसलिए नहीं टिक पाई, क्योंकि संविधान में आर्थक आधार पर आरक्षण का प्रावधान नहीं था। इस बार, संविधान संशोधन के जरिए यह प्रावधान किया जा रहा है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट में कोई दिक्कत नहीं आएगी।
पहले भी हुईं कोशिशें, लेकिन लागू नहीं हो सका
सुप्रीम कोर्ट के 50 फीसदी की अधिकतम आरक्षण की सीमा की वजह से कई राज्य ने पहले ऐसे आरक्षण लागू करने की कोशिश की, लेकिन वैसे कानूनों के लिए सोर्स ऑफ पावर नहीं था, इसलिए इन्हें लागू नहीं किया जा सका। यह विधेयक न्यायिक समीक्षा में इसलिए टिकेगा क्योंकि इस विधेयक के जरिए संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 में संशोधन किया गया है। संविधान की मूल प्रस्तावना में सभी नागरिकों के विकास के लिए समान अवसर देने की बात कही गई है और यह विधेयक उसी लक्ष्य को पूरा करता है।
राजद ने बताया मध्यरात्रि की डकैती
राज्यसभा में बिल पेश होने के बाद शुरू हुई चर्चा के दौरान राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) सांसद मनोज झा ने सरकार पर निशाना साधते हुए इसे मध्यरात्रि की डकैती की संज्ञा दी। मनोज झा ने कहा कि इस बिल से ओबीसी वर्ग के लोगों के आरक्षण को खाने की कोशिश हो रही है। सपा ने भी मांग की है कि ओबीसी वर्ग का आरक्षण बढ़ाया जाना चाहिए।
मोदी ने बताया ऐतिहासिक पहल
जनरल कोटा बिल पर जहां राज्य सभा में चर्चा चल रही है, वहीं पीएम मोदी ने महाराष्ट्र की शोलापुर रैली में सरकार के इस कदम को ऐतिहासिक बताया। उन्होंने कहा कल देर रात लोकसभा में एक ऐतिहासिक बिल पास हुआ है। सामान्य वर्ग के गरीबों को 10 फीसदी आरक्षण पर मुहर लगाकर सबका साथ सबका विकास के मंत्र को और मजबूत करने का काम किया गया है।
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