
रायपुर। छत्तीसगढ़ का मुख्यमंत्री चुनने के लिए रायपुर में कांग्रेस विधायकों की बैठक में भूपेश बघेल को मुख्यमंत्री घोषित कर दिया गया। बैठक में पर्यवेक्षक मल्लिकार्जुन खड़गे और चुनाव प्रभारी पीएल पुनिया ने यह घोषणा की। मुख्यमंत्री पद की रेस में भूपेश सिंह बघेल और टीएस सिंह देव सबसे आगे चल रहे थे, जिसमें भूपेश बघेल ने बाजी मार ली। राज्य की इस सबसे प्रतिष्ठित सीट के लिए चार लोग दावा कर रहे थे। इसी वजह से चुनाव जीतने के पांच दिन बाद आलाकमान की इच्छा से इस यह मसला हल किया जा सका।
बाकी तीन उम्मीदवारो को पीछे छोड़ा
मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में हुए विधानसभा में कांग्रेस को सबसे प्रचंड जीत छत्तीसगढ़ में मिली है। इसी वजह से राज्य का मुख्यमंत्री चुनना सबसे कठिन साबित हुआ। राज्य का मुख्यमंत्री बनने की इस रस्साकशी में भूपेश बघेल, टीएस सिंह देव, ताम्रध्वज साहू और चरणदास महंत चार बड़े नामों पर मंथन हुआ और अंतत: राहुल गांधी की मुहर भूपेश बघेल के नाम पर लगी। कई ऐसे कारण हैं, जिसके चलते बघेल अन्य लोगों से आगे निकल गए।
संकट में निभाई बड़ी जिम्मेदारी
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का 15 साल का वनवास अब खत्म हो चुका है। राज्य में कांग्रेस की लहर के आगे पिछले 15 सालों से सत्ताधारी भाजपा धाराशाई हो गई है। पार्टी की इस बड़ी जीत का श्रेय अगर किसी को जाता है, तो वह हैं प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल। अपने आक्रामक तेवर के लिए पहचाने जाने वाले बघेल ने जब राज्य में पार्टी की कमान संभाली थी तो कांग्रेस कई मोर्चों पर संकट से जूझ रही थी। राज्य में कांग्रेस के पहली पंक्ति के नेता झीरम घाटी नक्सली हमलों में मारे जा चुके थे, जिसमें विद्याचरण शुक्ला, तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष नंद कुमार पटेल और महेंद्र कर्मा मुख्य तौर पर शामिल थे। पार्टी के सामने नेतृत्व का भीषण संकट पैदा हो गया था, साथ ही लगातार तीन चुनाव हारने की हताशा भी थी।
जोगी को बाहर कर संभाली कमान
बघेल को जो जिम्मेदारी मिली थी वह किसी बहुत बड़ी चुनौती से कम नहीं थी। उन्होंने न सिर्फ पार्टी में नई जान फूंकी, बल्कि पूर्व मुख्यमंत्री अजित जोगी और उनके बेटे अमित जोगी को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाने का साहस दिखाया। जब कांग्रेस के बड़े नेता मुख्यमंत्री रमन सिंह के खिलाफ नर्म रुख अपनाए हुए थे तब बघेल ने विधानसभा के भीतर और बाहर भाजपा सरकार पर सीधा हमला बोला। उस दौर में जोगी को भाजपा की 'बी टीम' कहा जाने लगा था। प्रदेश के कई मुद्दों को लेकर सड़क पर उतरे, नसबंदी कांड, अंखफोड़वा कांड, भूमि अधिग्रहण को लेकर हुए विवाद पर उन्होंने पदयात्राएं कीं और रमन सरकार को घेरा। विधानसभा चुनाव से पहले बघेल की प्रदेश के कई हिस्सों में पदयात्रा ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं में जोश भरा।
भूपेश बघेल ने खुद छत्तीसगढ़ के अन्नदाताओं की नब्ज पकड़कर उसे चुनावी मुद्दा बनाया और इसे अपने घोषणा पत्र में शामिल करवाया और इस तरह भाजपा को राज्य की सत्ता से बेदखल कर दिया।
मुकदमों से भी नहीं डिगे बघेल
जैसे-जैसे भूपेश बघेल का हमला रमन सरकार पर बढ़ता गया, वैसे ही बघेल और उनके परिवार पर कई तरह के मुकदमें भी लगाए गए। हाल ही में राज्य सरकार के मंत्री राजेश मूणत से जुड़ी एक कथित सेक्स सीडी के मामले में जब भूपेश बघेल को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया, तब उन्होंने जमानत लेने से इनकार कर दिया। बाद में आलाकमान के कहने पर वे जमानत पर रिहा हुए और चुनाव की कमान संभाली। बघेल के इस रुख ने उनकी छवि उस योद्धा के तौर बनाई जो किसी भी तरह के दबाव में झुकने वाला नहीं था।
कुर्मी जाति का खासा प्रभाव
एक किसान परिवार से संबंधित बघेल कुर्मी जाति से हैं। उनकी स्वीकार्यता की वजह से ही राज्य की ओबीसी बेल्ट में कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन किया है। मौजूदा सांसद और कांग्रेस के ओबीसी सेल के अध्यक्ष ताम्रध्वज साहू ने भी साहू समुदाय को कांग्रेस की तरफ लाने में अहम भूमिका निभाई है। साहू भी मुख्यमंत्री पद की दौड़ में थे, लेकिन अंतत: कुर्मी जाति से आने वाले बघेल को वरीयता दी गई। राज्य में कुर्मी और साहू समुदाय कुल आबादी का 36 फीसदी है, जो किसी भी दल को जीत दिलाने के लिए काफी है। जातीय समीकरणों के अलावा भूपेश बघेल की जो सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि है यह है कि जब ऐसा माना जा रहा था कि जोगी फैक्टर के चलते भाजपा एक बार फिर सरकार बना लेगी, तब बघेल के नेतृत्व में कांग्रेस ने जबरदस्त जीत हासिल कर सियासी पंडितों को हैरान कर दिया।
यह है उनका सियासी सफर?
80 के दशक में जब छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश का हिस्सा हुआ करता था, भूपेश ने राजनीति की पारी यूथ कांग्रेस के साथ शुरू की थी। दुर्ग जिले के रहने वाले भूपेश दुर्ग के यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष बने। 1994-95 में भूपेश बघेल को मध्यप्रदेश यूथ कांग्रेस का उपाध्यक्ष बनाया गया। 1993 में जब मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव हुए तो भूपेश कांग्रेस से दुर्ग की पाटन सीट से उम्मीदवार बने और जीत दर्ज की। उन्होंने बीएसपी के केजूराम वर्मा को करीब 3000 वोट से मात दी थी। इसके बाद अगला चुनाव भी वह पाटन से ही जीते। इस बार उन्होंने भाजपा की निरुपमा चंद्राकर को 3700 वोटों से मात दी थी। जब मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह की सरकार बनी, तो भूपेश कैबिनेट मंत्री बने। 2000 में जब छत्तीसगढ़ अलग राज्य बन गया और पाटन छत्तीसगढ़ का हिस्सा बना, तो भूपेश छ्त्तीसगढ़ विधानसभा पहुंचे। वहां भी वो कैबिनेट मंत्री बने। 2003 में कांग्रेस जब सत्ता से बाहर हो गई, तो भूपेश को विपक्ष का उपनेता बनाया गया। 2004 में जब लोकसभा के चुनाव होने थे, तो भूपेश को दुर्ग से उम्मीदवार बनाया गया, लेकिन भाजपा के ताराचंद साहू ने उन्हें करीब 65 हजार वोटों से मात दे दी। सन 2009 में कांग्रेस ने उनकी सीट बदली और राजधानी रायपुर से चुनाव लड़वाया। इस बार उनके सामने रमेश बैश थे। रमेश बैश ने उन्हें मात दे दी। अक्टूबर 2014 में उन्हें प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया और तब से वो इस पद पर हैं।
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