
ये तस्वीर किसी विवादित ढांचे की नहीं बल्कि दुनिया के सबसे ताकतवर लोकतंत्र के मंदिर की है।अमेरिका की संसद पर हमले की ये तस्वीर हमें डराती है। अमेरिका में सत्ता हस्तांतरण के पहले जो कुछ हुआ सो अकल्पनीय था। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने समर्थकों के जरिए संसद पर हमला कर सदियों पुरानी लोकतांत्रिक व्यवस्था की चूलें हिला दीं हैं। वाशिंगटन अवाक है! लेकिन गनीमत है कि दुस्साहस करने वाले ट्रंप को बहुत जल्द हकीकत समझा में आ गई।
हम भारतीय खुशनसीब हैं कि हमारे यहां अभी भी सत्ता का हस्तांतरण वोट के माध्यम से हो रहा है। लेकिन सत्ता में बने रहने और सत्ता हथियाने के लिए जो कोशिशें हो रही हैं वे लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं है। जनादेश से बनी सरकार जब जनादेश की अनदेखी, अनसुनी कर उठे तो सावधान हो जाना चाहिए।
सत्ता लोलुपता व्यक्ति को किसी भी सीमा तक ले जा सकती है। इतिहास इस तरह की घटनाओं से भरा पड़ा है।जिन देशों ने अतीत से सबक लेकर लोकतांत्रिक व्यवस्था को चुना,वे फायदे में रहे।पर अब खतरा इसी लोकतंत्र पर है। लोकतंत्र कोई अमूर्त कला नहीं है बल्कि एक शैली है जिसकी जड़ें मजबूत और गहरी हैं । अमेरिका में हुई ताजा हिंसा ने दुनिया को आशंकित, आतंकित किया है।अब लगता है कि जब लोकतंत्र के साथ बर्बरता जब अमेरिका में हो सकती है तो कहीं भी हो सकती है,भारत में भी।
'लोकतंत्र खतरे में है' कहना अब सिर्फ जुमला नहीं है,नारा नहीं है अपितु एक वास्तविकता है, इसलिए अब विशेष ध्यान देने की जरूरत है। दुनिया भर की लोकतांत्रिक ताकतों को एकजुट होकर लोकतंत्र की मजबूती और रक्षा के लिए काम करना होगा।
भारत में लोकतंत्र के साथ अनाचार हुए चार दशक से अधिक हो चुके हैं।तब संसद पर हमला भले न हुआ हो लेकिन पूरी संसद को बंदी और बांदी बना दिया गया था। भगवान का शुक्र है कि तब के नेतृत्व को अक्ल समय पर आ गई और संसद १९माह बाद ही आजाद हो गई।आज फिर वैसी ही आहटें सुनाई दे रही है। किसान ४२ दिन से सड़क पर हैं किन्तु संसद और सरकार को सुनवाई में कोई दिलचस्पी नहीं है। तारीख पर तारीख का नाटक किया जा रहा है।
मुझे कोई संदेह नहीं है कि हालात जानबूझकर खराब किए जा रहे हैं। बहाने तलाश किए जा रहे हैं ताकि लोकतांत्रिक अधिकारों को एक बार फिर पंगु बनाया जा सके। लोकतांत्रिक संस्थाएं पहले से ही तोता-मैना और केंचुआ बनाई जा चुकी है। निर्वाचित सदनों की उपयोगिता को सीमित किया जा रहा है, ऐसे में खतरा दो कदम दूर ही तो है।
अमेरिका के घटनाक्रम को यहां से केवल महसूस किया जा सकता है, समझा नहीं जा सकता। सत्ता लोलुपता के विषाणु अमेरिका में कैसे और कब पनपे ये पता करना बहुत जरूरी है, क्योंकि इनका फैलाव बड़ी तेजी से होता है। सियासत का नया स्ट्रेन सबका स्ट्रेस बढ़ा सकता है। इसलिए सावधान रहिए,अपनी जिम्मेदारी समझिए।
@राकेश अचल
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