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आत्ममंथन : MP में बीजेपी की हार या कांग्रेस की जीत? वो 10 कारण जिनकी वजह से मध्य प्रदेश में मिली हार
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आत्ममंथन : MP में बीजेपी की हार या कांग्रेस की जीत? वो 10 कारण जिनकी वजह से मध्य प्रदेश में मिली हार

भोपाल, 13 दिसंबर, न्यूज़ मंच, भारतीय जनता पार्टी के लिए 2018 विधानसभा चुनाव के नतीजे आशानुरूप नहीं रहे। कांग्रेस की तुलना में भाजपा का संख्‍याबल कम रहा और इसी थोड़े से संख्‍या बल के कारण भाजपा बहुमत के आंकड़े के करीब पहुंचने के बाद भी सरकार बनाने से चूक गई।

मंजिल के बेहद नजदीक पहुंचने के बाद भी सत्‍ता हासिल में नाकामयाब रही भाजपा को हार के कारणों पर आत्‍ममंथन करना जरूरी है, अन्‍यथा लोकसभा 2019 में भी भाजपा को मुहं की खानी पड़ सकती है। हालांकि सीएम शिवराज सिंह चौहान ने हार की जिम्‍मेदारी ली है, लेकिन न्‍यूज मंच द्वारा की गई पड़ताल में हार के जो कारण सामने आएं, उनका बिंदुवार विश्‍लेषण आप नीचे पढ़ सकते हैं

कांग्रेस के घोषणा पत्र में क़र्ज़ माफ़ी का वादा 
किसानो को कांग्रेस सरकार आते ही 10 दिन के अंदर क़र्ज़ माफ़ी का दावा करना कांग्रेस को चुनाव प्रचार में बहुत फायदा पहुंचा गया, लेकिन इस तरह के वादे कहाँ तक पूरे होते हैं, यह तो अगले 10 दिन में साफ़ हो जायेगा। 

एंटी इंकम्बैंसी फैक्टर 
मध्य प्रदेश में बहुत अधिक एंटी इंकम्बैंसी का असर दिखा। 13 वर्ष तक मुख्य मंत्री बने रहने वाले शिवराज को प्रदेश की जनता ने बदल कर देखने का एक प्रयास किया है।  कांग्रेस ने जीत के बाद पूरे एक दिन के विचार मंथन के बाद यहाँ से कमल नाथ को मुख्य मंत्री बनाने का निर्णय लिया है।  कांग्रेस पार्टी और उनके नेता प्रदेश की जनता की उम्मीद पर कितने खरे उतरेंगे, ये भी कुछ ही दिन में साफ़ होने लगेगा।  

किसान आंदोलन 
मालवा निमाड़ में कुल 66 सीटों में से 38 ग्रामीण सीटें हैं।  इन 38 सीटों में से 28 पर कांग्रेस की जीत हुई है।  इसी प्रकार, ग्वालियर चम्बल में कुल 34 सीटों में से 18 ग्रामीण सीटें हैं, जिनमे से 15 कांग्रेस को मिल गयी हैं।  जिससे ये साफ़ होता है कि किसान आंदोलन का असर मध्य प्रदेश पर काफी गहरा हुआ है। 

हालाँकि किसान आंदोलन जिस जगह सबसे ज़्यादा उग्र हुआ था, यानि, मंदसौर, यहाँ वोट शेयर तो घटा पर बीजेपी को 8 में से 7 सीट पर जीत हासिल हुई है। तो यह समझ नहीं आया कि किसान अगर इतना नाराज़ था तो मंदसौर की पूरी 8 सीट कांग्रेस को क्यूँ नहीं मिली।  

सवर्ण आंदोलन और सपाक्स का उदय

मध्य प्रदेश में SC/ST एक्ट पर आये सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मोदी सरकार ने संशोधन कर सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दिया था। अब सवर्ण और ओबीसी समाज सरकार के फैसले के खिलाफ खड़ा हो गया।  एससी एसटी एक्ट के खिलाफ पूरे प्रदेश, खास तौर पर, ग्वालियर-चम्बल और मालवा-निमाड़ के सामान्य वर्ग में जबरदस्त नाराजगी थी।  प्रदेश के शिवपुरी, भिंड और छतरपुर में धारा 144 लागू कर दी गई।  
सवर्ण आंदोलन के दौरान करनी सेना और सपाक्स ने कई रैलियां की और भाजपा को इन क्षेत्रों में बहुत अधिक नुक्सान पहुँचाया। 
इसी दौरान भोपाल के टीटीनगर दशहरा मैदान पर आयोजित अनुसूचित जाति-जनजाति अधिकारी-कर्मचारी संघ के सम्मेलन में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बड़ा बयारेस के हाथ न दिया। उन्होंने कहा कि हमारे रहते हुए कोई माई का लाल आरक्षण खत्म नहीं कर सकता। माना जा रहा है की शिवराज के इस भाषण ने मालवा निमाड़ में बीजेपी को बहुत नुक्सान पहुँचाया।

कमलनाथ और ज्योतिरदियत्य की अपने क्षेत्रों में कड़ी मेहनत 
कमलनाथ ने महाकौशल और मालवा निमाड़ में अपनी पूरी ताकत लगाई तो वही ग्वालियर चम्बल में, ज्योतिरादित्य ने मोर्चा सम्हाला।  परिणाम स्वरुप, मालवा - निमाड़ में कुल 66 सीटों में से, कांग्रेस के हाथ 35 सीट आयीं, और बीजेपी का कमल 28 पर खिल पाया।  इसी तरह, महाकौशल में कुल 38 में से 24 सीटें कांग्रेस के पास आयीं, और 13 पर बीजेपी को जीत हासिल हुई।  ग्वालियर - चम्बल की 34 सीटों में से कांग्रेस 26 पर कांग्रेस जीती और बीजेपी के पास मात्र 7 सीट लगीं।    

मायावती ने वोट काटे 
बहुजन समाज पार्टी मध्य प्रदेश में मात्र 2 ही सीटों पर जीत पायी मगर, मायावती की मेहनत की वजह से इतना ज़रूर हो पाया कि जिन सीटों पर SC / ST के मतदात बहुत अधिक थे, वहां बीजेपी के वोट शेयर प्रतिशत में गिरावट आयी। जिसका फायदा कांग्रेस को मिल गया। 

सरकार में बढ़ता भृष्‍टाचार और व्‍यापम जैसे घोटाले 
भाजपा सरकार में लगातार बढ़ता भृष्‍टाचार आम जन के लिए बड़ी समस्‍या बनता गया। सरकार का अधिकारियों पर नियंत्रण इस हद तक कमजोर हो गया था कि भाजपा कार्यकर्ताओं को भी हर छोटे-बड़े काम के लिए रिश्‍वत का सहारा लेना पड़ रहा था। इसी बीच व्‍यापम घोटाले के खुलासे के बाद आम जन का सरकारी सिस्‍टम से भरोसा उठ गया। फिर शिवराज की नाक के नीचे हो रहे इल्लीगल माइनिंग, लैंड स्कैम, डम्पर स्कैम और लगभग 3000 करोड़ रूपए के इ-टेंडर स्कैम पर भी विपक्ष ने चुनाव प्रचार के दौरान शिवराज को घेरा, जिसका कहीं न कहीं मध्य प्रदेश के चुनाव के परिणामो पर गहरा असर पड़ा है। 

केंद्र सरकार की नीतियां 

मध्य प्रदेश के चुनाव पर हाल हे में आये पेट्रोल डीजल की कीमतों में बढ़ोत्तरी, रूपए की कीमत में गिरावट, आरबीआई और सीबीआई जैसी शीर्ष एजेंसियों की भूमिका पर केंद्र सरकार का रुख, सुप्रीम कोर्ट के साथ केंद्र सरकार के रिश्ते, जीडीपी, फोरेक्स रिज़र्व आदि ने भी काफी बड़ा प्रभाव डाला है।  जनता अब जागरूक हो गयी है और केंद्र और राज्य को पारदर्शिता के साथ जनता के हित में कार्य करना बहुत महत्वपूर्ण हो गया है।  

बीजेपी कार्यकर्ताओं में दिखे अहंकार के स्वर 

जनतंत्र में हमेशा जनता की सरकार, जनता के द्वारा चुनी गयी सरकार और जनता के लिए सरकार बनती है।  लेकिन अहंकार हमेशा  " मैं " की भावना से प्रेरित होता है, और बीजेपी के प्रत्येक कार्यकर्ता, प्रवक्ता, नेता के स्वरों में लगातार यह शब्द प्रथम होता दिख रहा है और जनता का हित, विकास, एकता, आदि जैसे भाव दूर दूर तक दिखाई नहीं दे रहे हैं।  सभी नेता लगभग हर चुनाव प्रचार में कहते दिखे की " अबकी बार बीजेपी 200 पार ", लेकिन परिणाम आने के बाद देखा गया कि, मध्य प्रदेश तो दूर, सभी पांच राज्यों का कुल मिला कर भी 200 पार नहीं हो पाया। 

भितरघात और बागी नेता 
मध्यप्रदेश में हार का बहुत बड़ा श्रेय उन बागी नेताओं को जाता है, जिन्होंने अपनी सालों पुरानी पारंपरिक पार्टी को छोड़कर या तो निर्दलीय लड़ने का फैसला लिया या कांग्रेस पार्टी जॉइन कर ली। इसका हिस्सा बनने की दौड़ में खुद मुख्यमंत्री के साले संजय मसानी भी पीछे नहीं हटे और पार्टी के सीनियर नेता सरताज सिंह ने भी यही गलती की।  
इसका खामियाजा इन नेताओं को भुगतना पड़ा क्योंकि जनता ने बागियों को बहुत पसंद नहीं किया और इसके भी ऊपर पार्टी को बहुत अधिक नुकसान हुआ।  
इसी तरह एक और तबका उन कार्यकर्ताओं का था जो भीतरघात की राजनीती में उलझे थे।  उनके अनुसार, बीजेपी है अपने पुराने नेताओं के साथ सही व्यव्हार नहीं किया, तो वे अंदर ही अंदर पार्टी को खोखला कर रहे थे।  
इन दो प्रजातियों ने भाजपा को मध्यप्रदेश में बहुत नुकसान पहुंचाया

परिणाम आने के बाद शिवराज सिंह चौहान भावुक हो गए और उन्होंने इस हार की नैतिक ज़िम्मेदारी ली, जो कि सही कदम था।  शिवराज ने कहा, "कमी मुझमे कहीं न कहीं थी, कि मैं उस कसौटी पर खरा नहीं उतर पाया"

पूर्व मुख्य मंत्री ने यह कह कर भी बड़प्पन दिखाया कि "जाने अनजाने मेरे किसी काम से, किसी शब्द से, किसी भाव से 7.5  करोड़ मध्यप्रदेश वासियों का दिल अगर दुख हो तो मैं क्षमा प्रार्थी हूँ।"

मध्य प्रदेश छोड़ कर दिल्ली जाने की बात पर शिवराज बोले, "मेरी आत्मा मध्य प्रदेश में ही बसती है।" , और फिर 13 साल से गद्दी पर बैठा, जनता के दिलों पर राज करने वाला नेता भावुक हो गया, और आँखे भर आयीं।  

शिवराज सिंह चौहान बहुत  मजबूत मुख्य मंत्री रहे और उनकी विदाई से मध्य प्रदेश की आधी से ज़्यादा जनाता दुखी है।  यह एक मुख्य मंत्री के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है।  शिवराज इस ज़मीन के नेता रहे और जनता से उनका जुड़ाव बहुत गहरा है।  

नाराज़ जनता ने उन्हें हटा तो दिया, लेकिन कमलनाथ इस कसौटी पर कितने खरे उतारते हैं, यह समय बताएगा।  हालाँकि, कमलनाथ भी बहुत कद्दावर नेता हैं, और केंद्र में उनकी एक मजबूत स्टैंडिंग है।  महाकौशल ने अपना बीटा इस प्रदेश को दिया है, और उम्मीद है की वे अपना फ़र्ज़ पूरी शिद्दत के साथ निभाएंगे और हर कसौटी पर खरे उतरेंगे।  

शिवराज ने भी कहा है की वे एक अच्छे विपक्ष की भूमिका अदा करेंगे।  

कुल मिला कर, अगर हर समीकरण को देखा जाये, तो महाकौशल और ग्वालियर चम्बल में कांग्रेस ने वाकई बहुत महनत की है और जीत हासिल की है।  लेकिन पूरे मध्य प्रदेश के समीकरण कहते हैं कि ये कांग्रेस की जीत नहीं, बीजेपी की हार थी, जिसका फायदा कांग्रेस को जीत के रूप में मिला या सही मायनो में, कांग्रेस को बोनस मिल गया।  इस जीत के दम पर ये मान लेना की लोक सभा चुनाव भी कांग्रेस जीत जाएगी, ये पूरी तरह गलत है।  

हाँ इतना ज़रूर है, की बीजेपी का अहंकार टूटा है, और पार्टी में शांति देखते हुए लग रहा है के बहुत गहरा आत्ममंथन चल रहा है। 

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