
नई दिल्ली, 18 दिसंबर, न्यूज़ मंच, "चुनावी हार" - 2014 के बाद से यह शब्द बीजेपी के शब्दकोश का हिस्सा ही नहीं रह गया था। सम्पूर्ण भारत को "भगवा" करने की प्रधान मंत्री की ज़िद्द और दृढ़ निश्चय पार्टी को सफलता दिलाती जा रही थी। आत्मविश्वास उस चरम पर की "पराजय" शब्द सुनना भी गंवारा न था।
यही भावना अपने प्रत्येक मंत्री के अंदर रोपित की गयी। हर राज्य के मुख्य मंत्री के लिए "भगवा" एक मात्र लक्ष्य निर्धारित किया गया। साम, दाम, दंड, भेद - राजनीती और कूटनीति के सभी अस्त्र शास्त्र से लैस एक ऐसी सेना खड़ी की, जो सिर्फ सामने देख रही थी। बीजेपी एक के बाद एक जीत के परचम लहराए जा रही थी। विकास शब्द चारों और गुंजायमान था।
पर यह क्या! 2014 से चल रहा जीत का सिलसिला, अचानक 2018 के अंत में आकर कहाँ ठहर गया। पांच राज्यों में विधान सभा चुनाव हुए, और हर राज्य में हार हुई। क्या बीजेपी ने आगे देखना छोड़ दिया था, क्या विकास का पहिया ठहर गया था, क्या सेना के प्रदर्शन में कहीं कोई कमी आयी ? इन सवालों ने सत्तासीन पार्टी को हिला कर रख दिया।
सेना का मनोबल टुटा सा दिखा। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान भावुक हो रो पड़े। वसुंधरा राजे सिंधिया की आवाज़ में भी वो बात नहीं दिखी जो मुख्य मंत्री रहते हुए हुआ करती थी।
क्या यह पार्टी के प्रत्येक सदस्य के अंदर रोपित किये आत्मविश्वास का नतीजा था, या किसी को पता ही नहीं चला की आत्मविश्वास कब अभिमान में बदल गया। राहुल गाँधी को कमज़ोर समझ कर यह मान लिया गया कि उनके नेतृत्व में मुमकिन ही नहीं कि कांग्रेस जीत जाये।
सभी वार, सभी आंकड़े, विशेषज्ञों के अनुमान, धराशायी हो गए। कांग्रेस पांच में से तीन राज्यों में जीत गयी। और सब ख़तम हो गया !
क्या, वाकई सब ख़तम हो गया ? ऐसा वो मानते हैं जो सिर्फ जीत में ही देश का विकास देखते है। अगर सही मायनो में देखा जाये, तो जनतंत्र में हार कर भी विकास करवाया जा सकता है। आज देश को एक मजबूत विपक्ष की ज़रुरत है। ऐसा विपक्ष जो अटल बिहारी वाजपेयी ने भारत को दिया था। ऐसा विपक्ष जो सरकार के सही फैसलों में उसके साथ खड़ा रहे और समर्थन दे, लेकिन जहाँ सरकार के निर्णय में ये प्रतीत हो की निर्णय जनतंत्र से प्रेरित होकर नहीं, बल्कि मनमानी, हिटलरवाद या किसी त्रुटिपूर्ण तरीके से लिया गया है, तब विपक्ष सरकार के विरुद्ध खड़ा हो और देश के हित में अपनी आवाज़ उठाये।
ऐसा ही नज़ारा दिखा जब राजस्थान की पूर्व मुख्य मंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया, मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान और छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्या मंत्री रमन सिंह कांग्रेस के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री, क्रमश: अशोक गेहलोत, कमलनाथ और भूपेश बघेल के शपथ ग्रहण समारोह में पहुंचे और उन्हें बधाई दी।
अब देखना है कि जैसा तस्वीरों में देखा वैसा ही रिश्ता विपक्ष बनकर आगे भी निभाया जाता है। अगर ऐसा हुआ, तो ऐसी राजनीती स्वार्थ से प्रेरित न होकर जनतंत्र को मजबूत बनाने में अपनी भूमिका अदा करेगी।
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