
नई दिल्ली। कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के आंदोलन को शुक्रवार को एक महीना पूरा हो गया। शुक्रवार को हरियाणा के जींद में किसानों ने विरोध जताते हुए टोल प्लाजा को फ्री करा दिया। जींद-पटियाला राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित खटकड़ गांव के टोल प्लाजा के बैरियर को उठा दिया गया। किसी भी आने-जाने वाले से टोल नहीं लिया जा रहा है। वहीं किसान संगठनों के 11 नेताओं का क्रमिक भूख हड़ताल जारी है। इसके अलावा कई और भी लोग भूख हड़ताल पर बैठे हैं।
आंदोलनकारी किसान नए कृषि कानूनों को वापस लेने और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर फसलों की खरीद की गारंटी की मांग कर रहे हैं। पंजाब और हरियाणा देश के दो ऐसे राज्य हैं जहां सरकारी एजेंसियां किसानों से एमएसपी पर धान और गेहूं की पूरी खरीददारी करती हैं। फिर भी हरियाणा के किसान नेता और भारतीय किसान यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढ़ूनी कहते हैं कि सरकार को एमएसपी की गांरटी देने के लिए कानून बनाना चाहिए। चढ़नी ने कहा कि सरकार जब तक उनकी तमाम मांगों का कोई ठोस समाधान नहीं करेगी तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा।
चढ़नी ने कहा कि एमएसपी पूरे देश के किसानों का मसला है और इस पर कानून बनना चाहिए क्योंकि किसी फसल की पैदावार होने पर किसानों को औने-पौने भाव पर अपनी फसल बेचने को मजबूत होना पड़ता है। उन्होंने कहा कि इसलिए तीनों कानूनों की वापसी से भी बड़ा मसला एमएसपी का है जिस पर सरकार को विचार करना चाहिए।उत्तर प्रदेश के किसान नेता और भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत ने भी कहा कि एमएसपी पर फसल खरीद की गारंटी किसानों की बड़ी मांग है और सरकार को इस पर कानून बनाना चाहिए। बता दें कि सरकार ने प्रदर्शनकारी किसान संगठनों को एमएसपी पर फसलों की खरीद की मौजूदा व्यवस्था आगे भी जारी रखने का लिखित आश्वासन देने की बात कही है। मगर, राकेश टिकैत कहते हैं कि इस पर नया कानून बनना चाहिए। उन्होंने कहा कि पराली दहन समेत कुछ अन्य मसले भी हैं जिनका वह समाधान चाहते हैं।
उधर, कुछ ऐसे भी किसान संगठन हैं कि जो नये कानूनों के समर्थन में रोज केंद्रीय कृषि एंव किसान कल्याण मंत्री से मिलते हैं। इनमें ज्यादातर उत्तर प्रदेश के किसान संगठन हैं। इस संबंध में पूछे गए सवाल पर राकेश टिकैत ने कहा, उत्तर प्रदेश में भारतीय किसान यूनियन के सिवा कोई किसान संगठन नहीं है। अगर कोई किसान संगठन है तो मैं उनसे मिलना चाहूंगा और यह पूछना चाहूंगा कि किस तरह ये कानून किसानों के हित में हैं। वहीं गुरुवार को केंद्र सरकार ने फिर प्रदर्शनकारी किसान संगठनों को अगले दौर की वार्ता के लिए पत्र भेजकर उनसे वार्ता की तारीख व समय बताने का आग्रह किया। पत्र में कहा गया है कि आंदोलनकारी किसान संगठनों द्वारा उठाए गए सभी मौखिक और लिखित मुद्दों पर सरकार सकारात्मक रुख अपनाते हुए वार्ता करने के लिए तैयार है।
बता दें कि संसद के मानसून सत्र में कृषि से जुड़े तीनों अध्यादेशों से संबंधित तीन अहम विधेयकों संसद में पेश किए गए और दोनों सदनों की मंजूरी मिलने के बाद इन्हें कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) कानून 2020, कृषक (सशक्तीकरण एवं संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा करार कानून 2020 और आवश्यक वस्तु (संशोधन) कानून 2020 के रूप सितंबर में लागू किए गए। संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले करीब 40 किसान संगठनों के नेताओं की अगुवाई में किसान इन तीनों कानूनों को निरस्त करवाने की मांग को लेकर 26 नवंबर से दिल्ली की सीमाओं पर डेरा डाले हुए हैं।
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