
दतिया, न्यूजमंच। हाल ही में आए तमाम एग्जिट पोल के भंवर में फंसकर हार के मुहाने पर पहुंची भाजपा को चुनावी वैतरणी पार कराने के लिए सीएम शिवराज सिंह चौहान शनिवार को राजसत्ता की अधिष्ठात्री देवी कही जाने वाली मां बगुलामुखी की शरण में दतिया स्थित पीतांबरा शक्ति पीठ पहुंचे। यहां उन्होंने पत्नी साधना सिंह के साथ मां बगुलामुखी की विशेष पूजा अर्चना के तहत धार्मिक अनुष्ठान क्रिया पूर्ण की।
चुनावी थकान उतारने के लिए सीएम शिवराज सिंह चौहान परिवार के साथ बीते तीन दिनों से बांधवगढ़ में छुट्टीयां मना रहे थे। इसी बीच शुक्रवार शाम अलग-अलग न्यूज चैनलों और एजेंसियों के एग्जिट पोल सर्वे आने शुरु हुए, अधिकतर एग्जिट पोल में कांग्रेस को बढ़त मिलती दिखाई गई। एग्जिट पोल सर्वे आने के अगले ही दिन यानी आज (शनिवार) सीएम बांधवगढ़ से सीधे दतिया स्थित पीतांबरा पीठ के लिए रवाना हो गए। इसलिए माना जा रहा है कि एग्जिट पोल झूठे साबित हों और प्रदेश में एक बार फिर भाजपा की सरकार बनें, इसी मन्नत को लेकर सीएम शिवराज सिंह अपने परिवार के साथ राजसत्ता की अधिष्ठात्री देवी मां बगुलामुखी के शरण में पहुंचे थे।
बांधवगढ़ से दतिया के लिए रवाना होने के दौरान सीएम ने उमरिया में एग्जिट पोल पर मीडिया से चर्चा की। सीएम ने मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने की संभावना जताने वाले एग्जिट पोल पर कहा कि मैं अपना सबसे बड़ा सर्वेयर खुद हूं। सारे सर्वे झूठे साबित होंगे और मध्यप्रदेश में हम सरकार बनाएंगे।
इसलिए खास है पीतांबरा पीठ:-
मध्यप्रदेश के दतिया स्थित मां पीतांबरा शक्तिपीठ राजनैतिक मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए किए जाने वाले विशेष अनुष्ठानों के लिए प्रसिद्ध है। मां बगुलामुखी को शत्रु नाश की अधिष्ठात्री देवी के साथ ही राजसत्ता की देवी भी माना जाता है। इसलिए यहां राजनैतिक मनोकामनाओं और कोर्ट के मुकद्मों से मन्नतों को लेकर विशेष पूजा-अर्चना एवं धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। यहां के पंडितों के अनुसार जो राज्य आतंकवाद व नक्सलवाद से प्रभावित हैं, यदि वह मां पीताम्बरा की साधना व अनुष्ठान कराएं, तो उन्हें इस समस्या से निजात मिल सकती है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में देश की अलग-अलग सरकार भी मां बगुलामुखी की आराधना कर देश पर आए संकटों से निजात पा चुकी हैं।
सन् 1962 में चीन ने भारत पर हमला कर दिया था। उस समय देश के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू थे। भारत के मित्र देशों रूस व मिस्र ने भी सहयोग देने से मना कर दिया था, तभी किसी योगी ने पंडित जवाहर लाल नेहरू से पीतांबरा पीठ के स्वामी महाराज से मिलने को कहा। उस समय नेहरू जी दतिया आए और स्वामीजी से मिले। स्वामी महाराज ने राष्ट्रहित में 51 कुंडीय यज्ञ करने की सलाह नेहरू जी को दी।
अनेक विद्वान पंडितों एवं तांत्रिकों के निर्देशन में यज्ञ प्रारंभ किया गया। यज्ञ के नौंवे दिन, जब यज्ञ की पूर्णाहुति डाली जा रही थी और यज्ञ समापन की ओर था, उसी समय 'संयुक्त राष्ट्र संघ' का नेहरू जी को संदेश मिला कि चीन ने आक्रमण रोक दिया है। मन्दिर प्रांगण में वह यज्ञशाला आज भी बनी हुई है। पीतांबरा पीठ पर लगी पट्टिका पर इस घटना का उल्लेख भी है।
कहा जाता है कि जब-जब देश के ऊपर विपत्तियां आती हैं, तब-तब मौजूदा सरकारों के प्रतिनिधि गोपनीय रूप से मां बगलामुखी की साधना एवं खास अनुष्ठान जरूर करते हैं। जिससे मां पीतांबरा की कृपा से देश पर आने वाली बहुत सी विपत्तियां टल जाती हैं। मां पीतांबरा की कृपा का ऐसा ही उदहारण सन् 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय भी देखने को मिला था। तत्कालीन केन्द्र सरकारों द्वारा मां बगलामुखी की आराधना के लिए विशेष अनुष्ठान कराए गए थे।
सन् 2000 में भारत-पाकिस्तान के बीच शुरु हुए कारगिल युद्ध के समय भी विशिष्ट साधकों ने मां बगलामुखी की गुप्त रूप से साधनाएं एवं अनुष्ठान क्रियाएं की थीं। माना जाता है कि मां की ही कृपा थी कि विषम परिस्थितियों के बावजूद भी भारतीय सेना ने विशेष पराक्रम दिखाते हुए पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी थी। बताया जाता है कि यह यज्ञ तात्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कहने पर यहां कराया गया था।
शमशान पर बना है पीतांबरा पीठ, स्वामी जी के कठोर तप से जागृत हुईं मां बगुलामुखी, यह है इतिहास:-
पीताम्बरा शक्तिपीठ से जुड़े जानकार बताते हैं कि सन् 1935 में स्वामीजी द्वारा इस शक्तिपीठ को जागृत किया गया था। पीतांबरा शक्ति पीठ के प्रांगण में ही मां बगुलामुखी के साथ ही खंडेश्वर महादेव और मां धूमावती के दर्शनों का सौभाग्य मिलता है।
मां बगुलामुखी मंदिर के दायीं ओर महाभारतकालीन वनखंडेश्वर महादेव का मंदिर है, जिनकी तांत्रिक रूप में पूजा होती है। महादेव के दरबार से बाहर निकलते ही दस महाविद्याओं में से एक मां धूमावती के दर्शन होते हैं। सबसे अनोखी बात ये है कि भक्तों को मां धूमावती के दर्शन का सौभाग्य केवल आरती के समय ही प्राप्त होता है क्योंकि बाकी समय मंदिर के कपाट बंद रहते हैं।
पीतांबरा पीठ से एक जनश्रुति जुड़ी हुई है, इस जनश्रुति के अनुसार जिस स्थान पर आज पीतांबरा मंदिर है वहां कभी शमशान होता था, पीतांबरा मंदिर का निर्माण कराने वाले स्वामी जी उसी शमशान में माता की साधना किया करते थे। विशेष तप और साधना से स्वामी जी ने मां बगुलामुखी के इस पीठ को जागृत किया और मंदिर का निर्माण कराया।
जनश्रुति है कि पीतांबरा मंदिर में मां धूमावती की स्थापना नहीं करने के लिए कई विद्वान साधु संतों ने स्वामी जी से आग्रह किया था, लेकिन स्वामी जी ने यह कहते हुए धूमा माई की प्रतिमा की स्थापना कराई कि मां का भयंकर रूप दुष्टों के लिए है, भक्तों के प्रति तो मां अति दयालु हैं।" पीतांबरा पीठ स्थित धूमावती माता का मंदिर संपूर्ण विश्व में एक मात्र मन्दिर है।
पीठ से जुड़े जानकार बताते हैं कि पीताम्बरा पीठ में जिस दिन मां धूमावती की स्थापना हुई थी, उसी दिन स्वामी महाराज ने अपने ब्रह्मलीन होने की तैयारी शुरू कर दी थी। ठीक एक वर्ष बाद मां धूमावती जयन्ती के दिन स्वामी जी ब्रह्मलीन हो गए। यहां मां धूमावती की आरती सुबह-शाम होती है, लेकिन भक्तों के लिए धूमावती का मन्दिर सिर्फ शनिवार को सुबह-शाम 2 घंटे के लिए खुलता है। मां धूमावती को नमकीन पकवान, जैसे- मंगोडे, कचौड़ी व समोसे आदि का भोग लगाया जाता है।
वहीं मां बगलामुखी को भी आदिदुर्गा की दस महाविद्याओं में से एक महाविद्या माना गया है। कहा जाता है कि स्वामी जी ने अपनी बेहद कठिन तपस्या और आराधना से मां बगुलामुखी को प्रसन्न किया था और उनसे प्रार्थना की थी कि लोक कल्याण के लिए उनके नाम से स्थापित किए जा रहे इस पीठ पर वे स्वयं अपने भक्तों की मुराद सुनेंगी।
यहां चर्तुभुज रूप में विराजमान मां बगुलामुखी के एक हाथ में गदा, दूसरे में पाश, तीसरे में वज्र और चौथे हाथ में उन्होंने राक्षस की जिह्वा थाम रखी है। भक्तों को माता की प्रतिमा स्पर्श करना वर्जित है। भक्तों को मां के दर्शन एक छोटी सी खिड़की से ही होते हैं। पीले वस्त्र एवं आभूषण धारण करने के कारण मां बगुलामुखी को ही मां पीतांबरा के नाम से पुकारा जाता है। उन्हें पीली वस्तुएं ही चढ़ाई जाती हैं। पीतांबरा पीठ स्थित मां बगुलामुखी मंदिर की ऐसी मान्यता है कि आचार्य द्रोण के पुत्र अश्वत्थामा अजर अमर होने के कारण आज भी यहाँ पूजा-अर्चना करने आते हैं।
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