
केन्द्रीय रिजर्व बैंक और केन्द्र सरकार के बीच स्वायत्तता को लेकर जंग छिड़ी हुई है। आरबीआई और केन्द्र सरकार के बीच तनातनी का मामला तब सामने आया, जब केन्द्रीय बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने कुछ समय पहले यह कह दिया कि केन्द्र सरकार का केन्द्रीय बैंक के कामकाज में दखल देना देश के लिए खतरनाक स्थिति पैदा कर सकता है।
विरल आचार्य के इस बयान के बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली ने आरबीआई पर आरोप लगाया कि 2008 से 2014 तक केन्द्रीय बैंक ने कर्ज बांटने के काम की अनदेखी की, और देश के सामने गंभीर NPA समस्या खड़ी हो गई।
आरबीआई और केंद्र सरकार के बीच तनातनी की मुख्या वजह
इस तनातनी के दौरान आरबीआई और केन्द्र सरकार के बीच अहम अंतर पैदा हो चुके हैं। ऐसे में यह परिस्थिति तक पैदा हो गयी थी की उर्जित पटेल को इस्तीफा देना पड़ सकता था।
केन्द्र सरकार और आरबीआई के गवर्नर के बीच विवाद की अहम वजह है, केन्द्रीय रिजर्व बैंक के रिजर्व खाते में इस वक़्त 9.6 लाख करोड़ रुपये की रकम।
केन्द्र सरकार के मुताबिक इतनी बड़ी रकम रिजर्व बैंक के रिजर्व खाते में रहने का कोई औचित्य नहीं। केंद्र सरकार इस रकम में से एक-तिहाई रकम का उपयोग करके देश के कारोबार में तेजी लाना चाहती है।
वहीं केन्द्रीय बैंक सरकार के इस प्रस्ताव को अपनी स्वायत्तता पर हमला मान रही है।
केंद्र और आरबीआई की जंग पर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ-IMF) का मत :
इस जंग के बीच अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ-IMF) ने कहा है कि वह भारत में जारी विवाद पर नजर बनाए हुए है। उसने दुनियाभर में ऐसी सभी कोशिशों का विरोध किया है जहां केन्द्रीय बैंकों की स्वतंत्रता को सीमित करने की कोशिश की गई है। आईएमएफ का मानना है कि केन्द्रीय बैंक और सरकार के बीच जिम्मेदारी और जवाबदेही को स्पष्ट रखने की जरूरत है।
आईएमएफ के कम्युनिकेशन डायरेक्टर गेरी राइस के अनुसार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर केन्द्रीय बैंकों के काम में किसी तरह का दखल न देना सबसे आदर्श स्थिति है। यह स्थिति दुनिया के सभी देशों के लिए मान्य है कि केन्द्रीय बैंक या वित्तीय नियंत्रकों को अपना काम करने की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए।
केंद्र और आरबीआई की जंग पर पूर्व आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन का मत :
पूर्व आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने भी एक प्रमुख बिजनेस टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में ये कहा, कि भारत सरकार और केन्द्रीय रिजर्व बैंक के बीच मचे संग्राम पर तभी लगाम लग सकती है जब दोनों एक-दूसरे की मंशा और स्वायत्तता का सम्मान करें। उन्होंने कहा कि सरकार को अपना सुझाव बैंक के सामने रखना चाहिए और भारतीय रिजर्व बैंक को फैसला करने देना चाहिए। केंद्रीय बैंक के पास पूरा अधिकार है कि वह केंद्र सरकार के सुझाव को अस्वीकृत कर दे।
उन्होंने यह भी कहा कि एक स्वतंत्र और स्वायत्त केन्द्रीय बैंक से राष्ट्र को फायदा ही पहुंचता है। राजन ने विरल आचार्य द्वारा केंद्र सरकार को आरबीआई की स्वायत्तता के समर्थन में चेतावनी दिए जाने की सराहना भी की।
ज्ञात हो की मौजूदा गवर्नर उर्जित पटेल ने सितंबर 2016 में रघुराम राजन से केन्द्रीय बैंक की कमान अपने हाथ में ली थी।
पूर्व प्रधान मंत्री और पूर्व आरबीआई गवर्नर मनमोहन सिंह ने क्या कहा है बेटी दमन सिंह की पुस्तक में
पूर्व प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने अपनी बेटी दमन सिंह की पुस्तक "Strictly Personal: Manmohan and Gursharan" में लिखा है की आरबीआई और सरकार के बीच गतिशीलता आदान प्रदान से मुमकिन है, लेकिन यदि वित्त मंत्री कार्रवाई के एक निश्चित तरीके पर जोर देते हैं तो उनके मत की प्राथमिकता होगी।
ज्ञात हो कि पूर्व प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह 1982 से 1985 तक आरबीआई के गवर्नर थे। तब भारत के वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी थे। दमन सिंह की पुस्तक "Strictly Personal: Manmohan and Gursharan" 2014 में प्रकाशित हुई। इस किताब में मनमोहन सिंह ने बताया है कि किस तरह जब आरबीआई और प्रणब मुखर्जी के बीच एक लंदन स्थितीत कंपनी को अनुमति देने पर मतभेद हुए तो, यह मामला सुप्रीम कोर्ट केपास गया। तब SC के द्वारा वित्त मंत्रालय के निर्णय को प्राथमिकता दी गयी।
इस पुस्तक में मनमोहन सिंह के आरबीआई गवर्नर के रूप में इंदिरा गाँधी सरकार के साथ कई मुद्दों पर मतभेद के बारे में भी बताया है। बैंक लाइसेन्सेस के मुद्दे पर अपने रेसिग्नेशन के बारे में भी बताया है।
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