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मुरैना में समधी वॉर ने त्रिकोणीय मुकाबले को चौकोणीय मुकाबले में बदला
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मुरैना में समधी वॉर ने त्रिकोणीय मुकाबले को चौकोणीय मुकाबले में बदला

मुरैना, 24 नवंबर, न्यूज़मंच, मुरैना विधान सभा सीट पर अभी बीजेपी का कब्ज़ा है। यहां अमूमन भाजपा, कांग्रेस व बसपा के बीच त्रिकोणीय मुकाबला होता आया है । लेकिन इस बार त्रिकोणीय नहीं, बल्कि इस सीट पर बड़ा ही रोचक चौकोणीय मुकाबला देखने को मिलेगा। 

मौरेना विधान सभा सीट पर 2013 का परिणाम (Facts)

मुरैना विधान सभा सीट की निर्वाचन क्षेत्र संख्या 6 है। यह सीट SC या ST  के लिए आरक्षित नहीं है। मुरैना विधान सभा सीट, मुरैना लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र के मुरैना जिले में आती है। 
इस सीट पर 2013 के विधान सभा चुनाव में, बीजेपी से Rustam Singh की जीत हुई थी, और उन्हें 56744 वोट मिले थे। Rustam Singh के निकटतम प्रतिद्वंदी BSP से Ramprakash थे जिन्हे, 55040 वोट मिले थे। Rustam Singh और Ramprakash के बीच वोटों का अंतर 1704 था। 

2018 के विधान सभा चुनाव में बीजेपी के Rushtam Singh के विरुद्ध कांग्रेस के Raghurajsingh Kasana और बसपा के Balweer Singh लड़ रहे हैं । पिछले चुनाव में BSP के Ramprakash इस बार AAP से लड़ रहे हैं।  

मुरैना में समधी वॉर 

मुरैना विधानसभा के चुनाव ने बहुत रोचक मोड़ ले लिया है। बसपा ने इस बार रामप्रकाश राजौरिया की टिकट काट दी, और उन्ही के समधी बलवीर सिंह डंडौतिया को टिकट दे दी।  इससे नाराज होकर रामप्रकाश आप से चुनाव मैदान में उतर आये, जिससे उनके समधी बलवीर परेशानी में आ गए। अब उनके समाज के वोट दो हिस्सों में बंट गए। 

बलवीर ने दो बार समधी जी के घर पंचायत करके अपने रूठे समधी को मनाने की कोशिश की।  यहाँ तक कि माफी भी मांगी, लेकिन रामप्रकाश को मना नहीं पाए। अब दोनों ही प्रत्याशी अलग अलग पार्टियों से उस एक ही वोट बैंक का वोट जीतने की कोशिश कर रहे हैं, जो उनका परंपरागत वोट बैंक माना जाता है। दोनों का ही दावा है कि हमें सारे समाज से भरपूर समर्थन मिल रहा है। 

चौकोणीय मुकाबले की संभावना कैसे बनी?

हाल ही में हुए दलित आंदोलन के कारण यहां बीजेपी का दलित वोट बैंक बसपा के खाते में जा सकता है। बीजेपी के रुस्तम सिंह मध्य प्रदेश सरकार में स्वास्थ्य मंत्री हैं। अपने मजबूत प्रत्याशी रामप्रकाश को बीजेपी के इतने मजबूत नेता के विरुद्ध टिकट न देने की बसपा की रणनीति कुछ समझ नहीं आयी। इस बार दलित आंदोलन की वजह से और बीजेपी के विरुद्ध एंटी इंकम्बैंसी फैक्टर की वजह से रामप्रकाश अपना मात्र 1704 वोटों का अंतर आसानी से कवर कर सकते थे।  पर बसपा ने ये रिस्क क्यूँ लिया, वो कहा नहीं जा सकता।  

इन वजहों से यहाँ बीजेपी, कांग्रेस, बसपा और आप के बीच चौकोणीय मुकाबले देखने को मिलेगा।  हालाँकि बसपा ही दलित आंदोलन की वजह से चारों में ज़्यादा मजबूत दिखाई दे रही है। 

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