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इस सीट पर 28 साल से नहीं खुला कांग्रेस का खाता, भाजपा और बसपा में होती है लड़ाई
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इस सीट पर 28 साल से नहीं खुला कांग्रेस का खाता, भाजपा और बसपा में होती है लड़ाई

सतना, 23 नवंबर, न्यूज़मंच, सतना की रैगांव विधानसभा सीट कभी भाजपा का गढ़ मानी जाती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं है। रैगांव विधानसभा सीट पर फिलहाल बसपा का कब्जा है। कांग्रेस इस सीट पर बीते 28 सालों से अपना खाता भी नहीं खोल पाई है। लेकिन इस बार चुनावी रणनीति को बदल कर कांग्रेस पराजय के सिलसिले को तोड़ना चाहती है। सतना की रैगांव सीट पर करीब 151767 मतदाता हैं। इस सीट पर हरिजन और कुशवाहों की बड़ी आबादी हैं। 

इस तरह सजी सियासी चौसर
कांग्रेस ने इस बार 70 के दशक में नागौद से कांग्रेस के विधायक रहे बाला प्रसाद के नाती की पत्नी कल्पना वर्मा को टिकट दिया है। जबकि, भाजपा ने 76 वर्षीय पूर्व मंत्री जुगुल किशोर बागरी पर भरोसा जताया है। बसपा प्रत्याशी के रूप में मौजूदा विधायक ऊषा चौधरी ही एक बार फिर चुनाव मैदान में हैं। इस सीट पर मुकाबला त्रिकोणीय माना जा रहा है। भाजपा के निशाने पर बसपा है, जबकि बसपा अपना सीधा मुकाबला कांग्रेस से मानती है।  


जातीय समीकरणों का सहारा 
अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित इस सीट पर हार-जीत  का अंतिम निर्णय अंतत: जातीयगत समीकरणों के ऊपर निर्भर करता है। बसपा और कांग्रेस दोनों ही दलों ने सजातीय प्रत्याशियों को मैदान में उतारा है, यह स्थिति भाजपा को अपने अनुकूल दिखाई देती है। लेकिन वह सवर्ण मतदाताओं को लेकर चिंता में है। सन 2013 में हुए विधानसभा में चुनाव भाजपा से नाखुश सवर्ण बसपा के पक्ष में जा खड़े हुए थे, जिस वजह से भाजपा को इस सीट पर पराजय का सामना करना पड़ा था। 


महंगी पड़ सकती है सवर्णों की नाराजगी
इस बार जिस एट्रोसिटी एक्ट के प्रावधानों में बदलाव किए जाने से सवर्ण भाजपा से नाराज हैं। भाजपा प्रत्याशी को डर है कि भाजपा से नाराज मतदाता इस बार कांग्रेस के समर्थन में जा सकते हैं। अगर सवर्ण मतों का इस तरह ध्रुवीकरण हुआ तो यह भाजपा प्रत्याशी के लिए मुश्किल पैदा करने वाली बात साबित होगी। दूसरी ओर कांग्रेस इस स्थिति को भुनाने की कोशिशों में जुट गई है। 


भाजपा के लिए मुश्किल बनीं बागरी
पूर्व विधायक धीरेन्द्र सिंह धीरु की पत्नी विमला बागरी सपाक्स के टिकट पर चुनाव मैदान में हैं। उनका दावा है कि नहर नहीं तो वोट नहीं से जुड़े ग्रामीण भी अब उनके साथ हैं। तो क्या सत्ता विरोधी लहर का उनका दावा भाजपा के सजातीय प्रत्याशी की राह में सचमुच बाधाएं पैदा करेगा? स्थानीय मतदाताओं में सपाक्स के प्रभाव से इनकार नहीं किया जा सकता, मगर  निजी स्तर पर सपाक्स प्रत्याशी का क्षेत्र में बहुत ज्यादा जनाधार नहीं है। इसे आंकड़ों से समझा जा सकता है। 

सवर्ण मतों पर निर्भर है सपाक्स
नवम विधानसभा के लिए जनतादल की टिकट पर विधायक चुने गए धीरेन्द्र सिंह धीरु ने वर्ष 2003 में शक्तिदल के टिकट पर दोबारा चुनाव लड़ा। इस बार उन्हें महज 4.22 फीसदी मत मिले थे। इसके बाद उन्होंने 2013 का चुनाव निर्दलीय के रूप में लड़ा, लेकिन इस बार भी स्थानीय मतदाताओँ ने उन्हें नकार दिया। इस बार उनका मत औसत गिर कर 3.15 हो गया। इस तरह देखा जाए तो उनका सारा चमत्कार सवर्ण मतदाताओँ पर ही निर्भर करता है, जिस पर कांग्रेस की भी नजर है। 


ये मुद्दे डालेंगे चुनाव पर असर
कृषि आश्रित क्षेत्र मगर सिंचाई का पर्याप्त प्रबंध नहीं। यहां सिर्फ एक उसरार डैम है, जो विस्तृत कृषि क्षेत्र की सिचाई के लिहाज से नाकाफी है। बारगी दाई तट नहर परियोजना अब तक पूरी नहीं हो सकी है। स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव भी यहां एक बड़ा मुद्दा है। १० गांवों से जुड़ा सिंहपुर सरकारी अस्पताल सिर्फ नाम का अस्पताल है। यहां पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं नहीं हैं। इस इलाके में पेयजल का भी भीषण संकट हैं। पेयजल से जुड़ी योजनाएं ईमानदारी से लागू नहीं की जा सकी हैं। क्षेत्र में कृषि का समुचित विकास नहीं होने की वजह से पर्याप्त संख्या में रोजगार नहीं पैदा हो सके हैं। जिसकी वजह से यहां से बड़ी संख्या में पलायन हुआ है। 

ये रहे विधायक
1977 : विश्वेश्वर प्रसाद, जनता पार्टी
1980 : धीरेन्द्र सिंह धीरु, जनता दल
1985: रामाश्रय प्रसाद, कांग्रेस
1993 : जुगुल किशोर बागरी, भाजपा
1998 : जुगुल किशोर बागरी, भाजपा
2003 : जुगुल किशोर बागरी, भाजपा
2008 : जुगुल किशोर बागरी, भाजपा
2013 : ऊषा चौधरी,           बसपा


रैगांव विधानसभा क्षेत्र
कुल मतदाता - 151767
मतदान केंद्र - 139
पुरुष मतदाता - 79946
महिला मतदाता - 71821

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