
जबलपुर, न्यूज़मंच, महाकौशल क्षेत्र की जनता को बहुत लम्बे समय से उम्मीद है कि, प्रदेश का मुख्य मंत्री इसी क्षेत्र से हो, और कमलनाथ से उन्हें इस उम्मीद के साकार होने की पूरी संभावना दिखाई देती है।
कमलनाथ का चेहरा और महाकौशल का गणित
कमलनाथ छिंदवाड़ा निर्वाचन क्षेत्र से सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले सांसद हैं। वे एक कुशल प्रबंधक, एक सक्षम प्रशासक और आर्थिक विकास के समर्थक के रूप में जाने जाते है। कमलनाथ एक कुशल रणनीति रचनाकार भी हैं, जो जानते हैं कि चुनाव लड़ने के लिए पार्टी को कैसे तैयार किया जाए।
वह मध्यप्रदेश में हर नेता की योग्यता और दोषों को अच्छे से जानते हैं, और उनकी इसी प्रतिभा ने पार्टी को सिर्फ महाकौशल में ही नहीं, बल्कि पूरे मध्य प्रदेश में लाभान्वित किया है। उनके पास सभी नेताओं को एक साथ लाने और पार्टी के भीतर गुटवाद को समाप्त करने की क्षमता भी है।
मालवा - निमाड़ का चुनावी गणित जानने के लिए यहाँ क्लिक करें
कमलनाथ की वजह से कांग्रेस की इस क्षेत्र पर अच्छी पकड़ है। इसी के रहते एक गूढ़ रणनीति के तहत अब तक कांग्रेस ने अपना मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित नहीं किया। और इस रणनीति का फायदा निश्चित तौर पर कांग्रेस को मिला है।
महाकौशल क्षेत्र में 8 जिले आते हैं जबलपुर, कटनी, नरसिंहपुर, सिवनी, बालाघाट, डिंडोरी, मंडला और छिंदवाड़ा।
इस क्षेत्र में 8 जिलों में कुल 38 सीट हैं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साले संजय सिंह मसानी को भी वारासिवनी से कांग्रेस का टिकट मिला है, जो महाकौशल क्षेत्र का ही हिस्सा है। इसकी वजह से महाकौशल क्षेत्र में चुनाव और भी मनोरंजक रूप ले चुके हैं।
इस क्षेत्र में 2003 के चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ 5 सीट मिली थी वहीं भाजपा को 32 सीटों से पर विजय हासिल हुई थी। 2008 के इलेक्शन में कांग्रेस की सीट बढ़कर 16 हो गई थी और भाजपा की 22 सीट हो गई थी। लेकिन फिर मोदी लहर के चलते, कांग्रेस की सीट 2013 के चुनाव में कुछ कम होकर 13 हो गई और बीजेपी की सीट बढ़कर 25 हो गई।
1977 के आम चुनावों में, कांग्रेस ने राज्य में 40 लोकसभा सीटों में से 39 खो दी थीं। महाकौशल क्षेत्र में छिंदवाड़ा एकमात्र निर्वाचन क्षेत्र था, जिस पर कांग्रेस उम्मीदवार जीता था। कमलनाथ 1980 में पश्चिम बंगाल से आये और मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले से लोकसभा चुनाव लड़े। 1980 से, कमल नाथ कभी हारे नहीं हैं।
एक केंद्रीय मंत्री के रूप में, उन्होंने हमेशा कांग्रेस के सभी महत्वपूर्ण नेताओं के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखा है। इसी का असर है की कांग्रेस की जड़ें इस क्षेत्र में मजबूत हुई हैं।
क्या महाकौशल बीजेपी से संतुष्ट ?
2013 के चुनाव में मोदी लहर की वजह से जहाँ पूरे मध्य प्रदेश में कांग्रेस को बड़ा नुकसान हुआ था, वहीँ महाकौशल क्षेत्र ने ही कांग्रेस को सम्हाला था।
इस क्षेत्र में आदिवासी जनसँख्या का प्रतिशत बहुत अधिक है, और लघु उद्योग भी बहुतायत में हैं। बीजेपी सरकार ने अपने 14 साल के शासनकाल के दौरान उनके सशक्तिकरण के लिए कुछ भी नहीं किया।
महाकौशल में गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का प्रभाव
गोंडवाना गणतंत्र पार्टी भी इस क्षेत्र में मौजूद है और दोनों ही मुख्य दलों, कांग्रेस और बीजेपी, को इसकी उपस्थिति महसूस हुई है। यह महाकोशाल के जनजातीय बेल्ट में दोनों पक्षों के वोटों को खा सकती है। गोंडवाना गण तंत्र पार्टी बालाघाट, सेनोई, डिंडोरी और छिंदवाड़ा के कुछ हिस्सों सहित, निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव परिणामों को प्रभावित कर सकती है।
महाकौशल में बीजेपी और आरएसएस का प्रभाव
अपनी संगठनात्मक ताकत के कारण बीजेपी इस क्षेत्र में लाभान्वित हो सकती है। महाकौशल में बीजेपी और आरएसएस की जड़ें बहुत गहरी हैं। भगवा पार्टी का मानना है कि इस संगठनात्मक ताकत के कारण वो महाकौशल में फिर से जीत पाएगी। बीजेपी की जीत सुनिश्चित करने के लिए आरएसएस भी इस क्षेत्र में दिन-रात काम कर रहा है।
कांग्रेस को महाकौशल में जीतने की उम्मीद क्यूँ ?
कांग्रेस भाजपा के खिलाफ 15 साल की विरोधी सत्ता पर और कमलनाथ के ऊपर भरोसा रख कर इस क्षेत्र में जीतने की उम्मीद कर रही है।
Leave Comments