
श्रीलंका, न्यूज़मंच, 26 अक्टूबर 2018 को श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना ने प्रधान मंत्री रानिल विक्रमसिंघे के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार से समर्थन वापस लेकर, रानिल विक्रमासिंघे को हटा दिया था। इसके बाद उन्होंने महिंदा राजपक्षे को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिला दी। सिरीसेना के इस कदम से श्रीलंका में राजनैतिक अस्थिरता पैदा हो गई।
रानिल विक्रमसिंघे ने अपने आप को सिरिसेना द्वारा इस तरह से हटाए जाने के फैसले को पूर्णतः असंवैधानिक बताया था। उन्होंने यह भी मांग की कि उन्हें संसद में बहुमत साबित करने का मौका दिया जाये।
सभी ऒर से हो रहे विरोध के बाद भी सिरीसेना ने संसद को भी 16 नवंबर तक के लिए स्थगित कर दिया।
देश के अंदर विरोध के स्वर और तेज़ होने लगे और देश व अंतरराष्ट्रीय दबाव में आकर उन्होंने 14 नवंबर से फिर संसद को चालू करने का नोटिस जारी कर दिया।
लेकिन संसद चालू होने के पहले ही 9 नवंबर को उन्होंने संसद भंग कर दी और 5 जनवरी को जनरल इलेक्शन की घोषणा कर दी।
राजपक्षे को 225 सदस्यों की संसद में सरकार बनाने के लिए 113 सदस्यों का समर्थन चाहिए था। इस सबसे ये तो साफ़ हो गया की महिंदा राजपक्षे के पास बहुमत साबित करने के लिए पर्याप्त सदस्यों का समर्थन नहीं था।
इसी के ठीक 2 दिन बाद, 11 नवंबर को महिंदा राजपक्षे ने रविवार को सिरिसेना की श्रीलंका फ्रीडम पार्टी (एसएलएफपी) से 50 साल पुराना गठबंधन तोड़ दिया। वे अब नवगठित श्रीलंका पीपुल्स पार्टीे (एसएलपीपी) में शामिल हो गए हैं। राजपक्षे के पिता डॉन एल्विन सिरिसेना की श्रीलंका फ्रीडम पार्टी (एसएलएफपी) के संस्थापक सदस्य थे, जो की 1951 में बानी थी।
राजपक्षे के इस कदम से अनुमान लगाया जा रहा है कि, वे 5 जनवरी को होने वाले चुनाव में अकेले ही लड़ेंगे।
राजपक्षे के समर्थकों ने एक मंच के तौर पर, पिछले साल SLPP का गठन किया था, जिससे उनके राजनीती में वापस लौटने के रस्ते खुल जाएँ। राजपक्षे श्रीलंका की राजनीती में एक मजबूत नेता हैं। लेकिन इस तरह से उठाये उनके और राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना के असंवैधानि कदम को बहुत से राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर निन्दनिये बताया है, और उन्हें सभी ओर से विरोध का सामना करना पड़ा है।
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